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गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

by श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी)

DevanagariHindipublished647 pages

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गुण भी गौण तथा महत्त्वहीन हो जाएँगे। किन्तु, भगवान् के प्रति प्रेम गौण और महत्त्वहीन नहीं है। यह स्पष्ट रूप से देखा जाता है कि भगवान् के प्रति प्रेम परम महत्त्वपूर्ण है। भगवान् के गुणों का वर्णन श्रुति-शास्त्र में इस प्रकार है: विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ॥ "परम पुरुष भगवान् ज्ञान और आनन्द-स्वरूप हैं।" यः सर्वज्ञः सर्वविद् ॥ "परम पुरुष भगवान् सर्वज्ञ एवं सर्ववित् (सब कुछ जानने वाले) हैं।" आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् ॥ "विद्वान् पुरुष ब्रह्म के आनन्द को भली-भाँति जानता है।" संशय: क्या उपास्य परमतत्त्व स्वयं ज्ञान और आनन्द रूप गुण ही है, और इस प्रकार निर्विशेष (निराकार) है, अथवा परमतत्त्व वह परम पुरुष है जो आनन्द और ज्ञान आदि गुणों से सम्पन्न है? पूर्वपक्ष: क्योंकि शास्त्रों में दोनों ही पक्षों का प्रतिपादन मिलता है, अतः किसी एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव नहीं है। सिद्धान्त: निम्नलिखित शब्दों में सूत्रकार (महर्षि बादरायण) अपना निर्णय प्रस्तुत करते हैं। सूत्र २८ उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ॥ २८ ॥ उभय — दोनों का; व्यपदेशात् — कथन होने से; तु — किन्तु/निश्चय ही; अहि — सर्प; कुण्डल — और उसकी कुण्डली (वलयाकार स्थिति); वत् — के समान। अन्वय-अर्थ: दोनों ही प्रकार के (अभेद और भेद के) श्रुति-वचनों का व्यपदेश होने से, ब्रह्म और उसके गुणों का सम्बन्ध सर्प और उसकी कुण्डली के समान है। श्रीमद्बलदेवविद्याभूषण-विरचित गोविन्दभाष्य तात्पर्य