गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
by श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी)
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Read in context... चेत्; न — नहीं; अपूर्वत्वात् — अपूर्व (नवीन विधान) होने के कारण। यदि यह कहा जाए कि यह केवल स्तुति मात्र है, तो उत्तर है कि नहीं, क्योंकि यह अपूर्व (नवीन) है। श्रील बलदेव विद्याभूषण-विरचित तात्पर्य: अत्र पूर्वपक्षी आह — ये वचन केवल कोरी प्रशंसा (स्तुतिमात्र) हैं, वे यथार्थ सत्य नहीं कहते। जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेयसी से कहता है, "तुम जो चाहो करने के लिए स्वतंत्र हो", किन्तु उसका यह वास्तविक अभिप्राय नहीं होता कि प्रेयसी यथार्थतः कुछ भी कर सकती है; उसी प्रकार यह कहा गया है कि दिव्य ज्ञान में स्थित व्यक्ति स्वेच्छानुसार कुछ भी कर सकता है। यदि ऐसा आक्षेप हो, तो सूत्र समाधान करता है — "न" (नहीं, ऐसा नहीं है)। किस कारण से? सूत्र कहता है — "अपूर्वत्वात्" (क्योंकि यह अपूर्व अर्थात् नवीन प्रतिपादन है)। क्योंकि यह कथन कि साक्षात् परब्रह्म परमात्मा का दर्शन करने वाला व्यक्ति अपनी इच्छानुसार वैदिक अनुष्ठान कर सकता है, एक सर्वथा अपूर्व उपदेश है; अतः यह पूर्व-प्रतिपादित विषय की केवल प्रशंसा मात्र नहीं हो सकता। यह इसका तात्पर्य है। सूत्र २२ भावशब्दाच्च ॥ २२ ॥ भाव — प्रेम (भगवद्भाव); शब्दात् — श्रुति-शब्द होने से; च — और भी। श्रुति-शास्त्र में भगवत्प्रेम (भाव) का प्रतिपादन होने के कारण भी। श्रील बलदेव विद्याभूषण-विरचित तात्पर्य: मुण्डकोपनिषद् (३.१.४) में कहा गया है — प्राणो ह्येष सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी । आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा- नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ अनुवाद: "परम पुरुष भगवान् ही सबके प्राण हैं। वे समस्त भूत-प्राणियों में पूर्णतः प्रकाशित हैं। जो उन्हें यथार्थतः जान लेता है, वह तत्त्ववेत्ता विद्वान् होकर व्यर्थ प्रलाप (अतिवाद) नहीं करता। वह आत्म-क्रीड़ (परमात्मा में ही रमण करने वाला), आत्म-रति (परमात्मा में ही प्रेम रखने वाला) तथा भगवत्सेवा रूपी क्रियावान् होकर ब्रह्मवेत्ताओं में सर्वश्रेष्ठ होता है।"