गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
by श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी)
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Read in contextब्रह्मसूत्रम् — तृतीयाध्यायः, चतुर्थः पादः
सर्वपेक्षाधिकरणम् (सूत्र २६-२७)
[पूर्वसूत्र-भाष्यशेषः — सूत्रम् २६] संस्कृत-भाष्यम् (श्रीगोविन्दभाष्यम् — श्रीबलदेवविद्याभूषणविरचितम्): यद्यपि विद्या स्वफलोत्पादने निरपेक्षा, तथापि स्वोत्पत्तौ यज्ञादीनि सर्वाण्याश्रमानुष्ठेयानि कर्माणि अपेक्षते। कुतः? 'यज्ञादिश्रुतेः'—तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन (बृहदारण्यकोपनिषत् ४।४।२२) इति श्रुतेः। अत्र उदाहरणम्—'अश्ववत्'। यथा कश्चित् जनः ग्रामगमनाय अश्वम् अपेक्षते, न तु ग्रामं प्राप्तवतोऽश्वेनास्ति प्रयोजनम्; तथैव विद्याया उत्पत्तये कर्मापेक्षितम्, न तु लब्धविद्यायाः फलप्राप्तये। हिन्दी-अनुवादः यद्यपि आत्मविद्या (ब्रह्मज्ञान) अपने मोक्षरूपी फल को देने के लिए किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रखती, तथापि उस ज्ञान की उत्पत्ति के लिए यज्ञ आदि समस्त पुण्य-कर्मों की आवश्यकता होती है। ऐसा क्यों है? सूत्रकार कहते हैं—'यज्ञादिश्रुतेः' अर्थात् श्रुति में स्पष्ट रूप से यज्ञ आदि का विधान है। बृहदारण्यक उपनिषद् (४।४।२२ तथा २३) में ज्ञान-प्राप्ति के लिए दो सूचियाँ प्रस्तुत की गई हैं—एक में यज्ञ, दान आदि कर्म हैं तथा दूसरी में शम, दम आदि आन्तरिक गुण। सूत्रकार यहाँ 'अश्ववत्' (घोड़े के समान) दृष्टान्त देते हैं—जैसे गन्तव्य तक पहुँचने के लिए घोड़े की आवश्यकता होती है, किन्तु गन्तव्य पर पहुँच जाने के बाद घोड़े की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती; वैसे ही ज्ञान की उत्पत्ति में कर्मों की अपेक्षा है, फलप्राप्ति में नहीं। [आशङ्का / पूर्वपक्षः] ननु यदि यज्ञादिभिरेव विद्या सिद्ध्यति, तर्हि शमदमादीनां किं कृत्यम्? यदि प्रथम सूची के यज्ञ आदि कर्मों से ही ज्ञान उत्पन्न हो जाता है, तब शम-दमादि द्वितीय सूची के साधनों के अनुष्ठान की क्या आवश्यकता है? एतस्यां शङ्कायामुच्यते— [सिद्धान्त-सूत्रम् २७] शमदमाद्युपेतस्तु स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ २७ ॥ पदच्छेदः एवं पदार्थः: • शम-दमादि-उपेतः = शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह) आदि से सम्पन्न। • तु = निश्चय ही (शङ्का-निवारणार्थ)। • स्यात् = होना चाहिए (साधक को ऐसा होना आवश्यक है)। • तथापि = फिर भी (यज्ञादि के अनुष्ठान के बाद भी)। • तु = किन्तु / विशेषतः। • तद्विधेः = उनके विधान होने से (श्रुति द्वारा विहित होने के कारण)। • तदङ्गतया = विद्या के अङ्ग होने से। • तेषाम् = उनका (शम, दम आदि का)। • अवश्यानुष्ठेयत्वात् = अवश्य अनुष्ठान (अभ्यास) कर्तव्य होने से। उपनिषत्-श्रुति-प्रमाणम्: तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति। (बृहदारण्यकोपनिषत् ४।४।२३) श्रीगोविन्दभाष्यम् (श्रील बलदेव विद्याभूषण): सूत्रे तु-शब्दद्वयम् अवधारणे शङ्कानिरासे च प्रयुक्तम्। यद्यपि यज्ञादिसम्पत्तौ विद्या सम्भाव्यते, 'तथापि' मुमुक्षुः शमदमादियुक्त एव 'स्यात्'। कुतः? 'तद्विधेः'—"शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा" इति श्रुतौ तेषां विधानात्। यज्ञादीनि बहिरङ्गानि कर्माणि, शमदमादीनि च विद्याया अन्तरङ्गतया विधीयन्ते। अतः विद्याङ्गत्वात् तेषां शमदमादीनाम् अवश्यानुष्ठेयत्वं सिद्ध्यति। हिन्दी-भावार्थ एवं व्याख्या: सूत्र में दो बार प्रयुक्त 'तु' शब्द निश्चय का द्योतक है और शङ्का का निराकरण करता है। यद्यपि यज्ञादि पुण्य-कर्म ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए आवश्यक साधन हैं, तथापि साधक को निश्चय ही शम, दम, तितिक्षा आदि से युक्त होना चाहिए। ऐसा क्यों? क्योंकि श्रुति में उनका साक्षात् विधान है ("शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः...")। यज्ञ, दान आदि बहिर्मुख अशुद्धि को दूर करने वाले बहिरङ्ग साधन हैं, जबकि शम (मन का संयम), दम (इन्द्रिय-संयम) आदि ज्ञान के साक्षात् अन्तरङ्ग साधन हैं। अतएव, ज्ञान के पूर्ण सहायक अङ्ग होने के कारण मुमुक्षु साधक के द्वारा इनका अनुष्ठान अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।