हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
by विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर)
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Read in context[ १८ ] करने का पूर्ण अधिकार था; किंतु साथ ही साथ सबका यह भी कर्तव्य था कि मुसलमानों को अपनी शक्ति अनुसार मार भगाते। और यदि वे हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने में असफल भी रहते तो भी उन्हें यथासंभव असंख्य छोटे बड़े स्वतंत्र हिन्दु राज्य बनाने का प्रयत्न करना चाहिये था। परंतु जब उनके छोटे २ राज्य के सामने एक साम्राज्य के रूप में संगठित होने का प्रश्न छिड़ा तो वे उस समय की राजनैतिक अद्भुत परिस्थितियों के अधीन होकर एक दूसरे की योग्यता और नेकनीयती के सम्बन्ध में आशंका करने लगे और आपस ही में लड़ पड़े। मरहठे सोचने लगे कि उन्होंने मुस- लमानों, अङ्गरेज़ों और पुर्तगेज़ों से लड़कर हिंदू-धर्म की रक्षा की है; इसलिये वे शक्तिशाली हैं और उन में ही यह योग्यता है कि हिन्दुओं के प्रमुख बनकर रहें। दूसरे लोग सोचने लगे कि यह कोई उपयुक्त युक्ति नहीं। यद्यपि मरहठों ने विदेशियों को हराकर हिंदू-धर्म की रक्षा की है तथापि जो हिन्दुओं से और विशेषतः हिंदू-राजाओं से चौथ वसूल करके उन्हें अपने अधिकार में रखना चाहते हैं यह उनकी अनुचित और अनधिकार चेष्टा है। दोनों पक्षों का ऐसा सोचना स्वाभाविक ही था। मरहठों का ऐसा सोचना इसलिये स्वाभाविक था क्योंकि वे इतनी अधिक सफलता प्राप्त कर चुके थे और अभी तक सफलतायें प्राप्त करने की आकांक्षायें भी कर रहे थे, वे शुद्ध हृदय से विश्वास करने लगे कि हिंदू-धर्म का अस्तित्व और हिंदुओं की राजनैतिक और पारिवारिक स्वतंत्रता तभी स्थिर रह सकती है यदि वह अपने शक्ति को संगठित करके एक केंद्रीय राज्य की स्थापना करलें। और इस केंद्रीय राज्य की स्थापना का यह अर्थ था कि प्रत्येक हिन्दू उस बड़े साम्राज्य के हित के लिये उसकी अधीनता स्वीकार करे और अपने व्यक्तिगत स्वार्थों का परित्याग कर दे। उनका यह सोचना भी उचित ही जान पड़ता है कि जिस हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना उन्होंने विदेशियों से लड़कर अपनी वीरता और बाहुबल द्वारा की थी उसका प्रबन्ध दूसरों के हाथ में देना उचित नहीं है। सभी लोग इस बात को