हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
by विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर)
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Read in context[ ३५ ] मुसलमान जब मुसलमानों या हिन्दुओं के साथ लड़ते थे तो वे भी इसी नीति को ग्रहण करते थे । पुर्तगेज़, अंग्रेज़ और राष्ट्र, चाहे वे एशिया में हों या यूरोप में इस बात को सब उचित समझते थे कि जिन मुल्कों को वे विजय करें उन पर लड़ाई का चन्दा लगायें । दूसरा कारण यह भी था कि मरहठे, जिन्हें कई शत्रुओं से, जिनमें अधिकतर विदेशी और अन्यायी थे, एक ही साथ लड़ना पड़ता था, उनके मुक़ाबले के लिये वे इतनी बड़ी सेना, जो कि एक ही साथ अपने सैनिक-आधार पूना से एक ओर पंजाब तथा दूसरा ओर अरकाट तक लड़ रही थी, अपने धन से किसी भी प्रकार नहीं रख सकते थे, वे अपनी इस लड़ाई की प्रणाली को भी नहीं बदल सकते थे, क्योंकि ये इसके द्वारा शत्रुओं की युद्धनीति को छिन्न-भिन्न कर देते थे, जिससे शत्रु किसी और नीति की अपेक्षा अल्प समय मे मरहठों के आगे झुकने के लिये बाध्य हो जाया करते थे । मरहठों की इसी लड़ाई की प्रणाली को उनके शत्रु लूट या निर्दयतापूर्वक डाके के नाम से प्रख्यात करते हैं । मरहठे अगर इस अपराध के अपराधी ठहराये जा सकते हैं तो इस सिद्धांत के अनुसार सभी राष्ट्रों को अपराधी मानना पड़ेगा क्योंकि बोअरों तथा जर्मनी की लड़ाई में, लार्ड डलहौज़ी के अन्य राज्यों को अंग्रेज़ी राज्य में मिलाने के समय और सन् १८५७ ई० में नील की लड़ाई में यही नीति काम में लाई गई थी। तब इस नीति का उपयोग करते समय यह बात कही गई कि युद्ध के सिद्धांतों के अन्दर ऐसी नीति का उपयोग युक्तिसंगत है । इसलिये वही सिद्धांत हिन्दू-जाति की स्वतन्त्रता प्राप्त करने के सम्बन्ध मे लागू हो सकता है और विशेषतः उस अवस्था में जब कि औरंगज़ेब, टीपू और गुलामकादिर जैसे व्यक्तियों के साथ सामना था। लड़ाई में विजय पाने के लिये हरएक उपाय उचित ही था । इस कथन की पुष्टि करने के लिये, कि धार्मिक लड़ाई में सब कुछ उचित है, और दूसरी बातों में पड़कर हम