हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
by विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर)
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Read in context[ ४२ ] रूप में धन बह कर पूना में आया तो वह कृपणता के साथ जमा नहीं किया गया और न ही मनमाने भोग विलासों में ही व्यय किया गया वरन् वह अन्त में उपयोगी स्रोतों द्वारा बह कर भारत के तीर्थों और क्षेत्रों में चला गया । भारतवर्ष में कोई भी ऐसी पवित्र नदी न रही जिस पर घाट न बने हों, और कोई ऐसा घाट न रहा जहां पर एक बड़ी धर्म- शाला या ऊँचे कलशों वाले सुन्दर मन्दिर न बने हों और ऐसा कोई मन्दिर नहीं रहा जिस के लिये वृत्ति न लगाई गई हो । ये सब महा- राष्ट्र-हिन्दू साम्राज्य की दान वीरता और उदारता की साक्षी ही तो देते हैं । यद्यपि मरहठे रात दिन शत्रुओं का सामना करने के लिये लड़ते रहते थे तथापि जिंजी से लेकर तंजौर और ग्वालियर तक तथा द्वारका से जगन्नाथ तक का देश, जो मरहठों के शासन के भीतर था, शान्ति का जीवन व्यतीत कर रहा था । राज्यकर भी साधारण था और शासन न्याययुक्त हो रहा था । प्रजा अन्य किसी राज्य की प्रजा से अधिक सुखी और सम्पत्तिशाली थी। मरहठों के राज्य में सड़कें, डाक- विभाग, जेल, हस्पताल और इंजिनियरिंग विभाग का प्रबन्ध उस समय के अन्य राज्यों के प्रबन्ध से कहीं उत्तम था । इन बातों की सत्यता के लिये बहुत से प्रमाण विद्यमान हैं। यद्यपि कभी २ अशान्ति हो जाया करती थी, फिर भी लोग स्वतन्त्रता के सुख का अनुभव कर रहे थे और अपने राज्य को केवल प्रेम और श्रद्धा की दृष्टि से ही न देखते थे, वरन उस के लिये उन्हें अभिमान भी था और उस समय अपने जन्म के लिये परमात्मा को धन्यवाद देते थे । इन बातों की सच्चाई हम उस समय के पत्र-व्यवहारों, कविताओं, वीर रस की कथाओं, बखरों और साहित्य के द्वारा अच्छी प्रकार देख सकते हैं। और भी बड़े २ आंदोलनों की कमी न थी । बहुत सी रीतियां या झूठे विश्वास, जिन के कारण राष्ट्रीय या सामाजिक उन्नति में बाधा पड़ती थी, वे या तो साधारण बना दी गईं या उन का एक दम त्याग