हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
by विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर)
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Read in context[ ४७ ] औरङ्गजेब बादशाह हमारी जाति की सारी आशाओं को पायों तले रौंदे हुए निश्चिन्त बैठा हुआ था और लाखों तलवारें उसके क्रोध भरे पैरों की ठोकर के इशारे पर मृत्यु की भयंकर लीला रचाने के लिये सदा तय्यार रहती थीं। ठीक उसी समय 'या सकल भूमंडलाचिये ठायीं, हिन्दू ऐसा उरला नाहीं' ❄ हिन्दू युवकों का एक दल 'एका लहानशा कोनात' एक कोने में गुप्तसभा मे एकत्रित हुआ, और अपने स्वर्गीय राजाओं और रानियों, धूल में मिले उन सिंहासनों और राज्यमुकुटों तथा अपनी जाति की स्मारक राख की ढेर को साक्षी करके उन्होंने अपने धर्म और जाति के ऊपर किये गये अपमान का बदला लेने तथा हिन्दूशास्त्रों और ध्वजा का मान रखने के लिये उस अजेय शत्रु के विरुद्ध विद्रोह करने की शपथ खाई। जिस समय नवयुवकों का यह झुंड बाहर निकला तो उनके पास कुछ जंग (मुर्चा) लगी तलवारों के अतिरिक्त कुछ न था। दुनियां ने उनकी अवस्था का अनुमान करके कहा--'यह मूर्खतापूर्ण कार्य है'। बुद्धिमानों ने कहा "यह आत्महत्या है" और औरंगजेब ने कहा "छिः, छिः"। इन का अनुमान गलत नहीं था क्योंकि शिवाजी पहला व्यक्ति न था जिस ने विद्रोह किया हो । उससे पहले कई साहसी वीरों ने विद्रोह किया था पर वे असफल रहे जिस के कारण उन को विद्रोह का भयङ्करतम मूल्य देना पड़ा था। पर इस दल ने बदला लेने का दृढ़ निश्चय किया । उनका यह दृढ़ विश्वास था कि यदि ये अपने उद्देश्य मे सफल भी न हो सके और विद्रोह के परिणाम स्वरूप उन्हें बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति डालनी पड़ी तो वे अपने बलिदान द्वारा एक ऐसा बीज बो जाएगे कि आने वाली संताने देश को मुक्त कराने का अविश्रांत प्रयत्न करती रहेगी और सदैव दासता की बेड़ी मे न पड़ी रहेगी । ❄ जब कि एक भी ऐसा हिन्दू भूमण्डल पर न बचा था (जो मुसल- मानों से पद-दलित न हुआ हो)।