हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-६२ ] प्रसन्न या अप्रसन्न स्वामिका चिन्ह १०३ करटको ब्रूते—'अथ तत्र गत्वा किं वक्ष्यति भवान् ?'। स आह—'शृणु । किमनुरक्तो विरक्तो वा मयि स्वामीति ज्ञास्यामि' । करटको ब्रूते—'किं तज्ज्ञानलक्षणम् ?' । करटक बोला-'वहां जा कर क्या कहोगे ?' वह बोला-'सुनो । पहिले यह जानूंगा कि स्वामी मेरे ऊपर प्रसन्न है अथवा उदास है'. करटक बोला-'इस बातको जाननेका क्या चिन्ह है ?' दमनको ब्रूते—'शृणु,— दूरादवेक्षणं हासः संप्रश्नेष्वादरो भृशम् । परोक्षेऽपि गुणश्लाघा स्मरणं प्रियवस्तुषु ॥ ५९ ॥ दमनक बोला-'सुनो,-दूरसे बड़ी अभिलाषासे देख लेना, मुसकाना, समा- चार आदि पूछनेमें अधिक आदर करना, पीठ पीछेभी गुणोंकी बड़ाई करना, प्रिय वस्तुओंमें स्मरण रखना ॥ ५९ ॥ असेवके चानुरक्तिर्दानं सप्रियभाषणम् । अनुरक्तस्य चिह्नानि दोषेऽपि गुणसंग्रहः ॥ ६० ॥ जो सेवक न हो उसमेंभी स्नेह दिखाना, सुन्दर सुन्दर बचनोंके साथ धन आदिका देना और दोषमेंभी गुणोंका ग्रहण करना ये स्नेहयुक्त स्वामिके लक्षण हैं ॥ ६० ॥ अन्यच्च— कालयापनमाशानां वर्धनं फलखण्डनम् । विरक्तेश्वरचिह्नानि जानीयान्मतिमान्नरः ॥ ६१ ॥ और दूसरे-आज कल कह करके, कृपा आदिके करनेमें समय टालना तथा आशाओंका बढ़ाना और जब फलका समय आवे तब उसका खंडन करना ये उदास स्वामीके लक्षण मनुष्यको जानना चाहिये ॥ ६१ ॥ एतज्ज्ञात्वा यथा चायं ममायत्तो भविष्यति तथा करिष्यामि । यह जान कर जैसे यह मेरे बशमें हो जायगा वैसे करूंगा; यतः,— अपायसंदर्शनजां विपत्ति- मुपायसंदर्शनजां च सिद्धिम् । मेधाविनो नीतिविधिप्रयुक्तां पुरः स्फुरन्तीमिव दर्शयन्ति' ॥ ६२ ॥