हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-७६ ] राजाको तारतम्यसे ही काम लेनेकी आवश्यकता १०७ क्योंकि सेवक और आभरण योग्य स्थानमें ( जहांके वहां ) लगा दिये जाते हैं, जैसे मुकुट पैरमें और पाजेब शिर पर नहीं पहिनी जाती है ॥ ७१ ॥ अपि च,— कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणित्रपुणि प्रणिधीयते । न च विरौति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ७२ ॥ और भी सुवर्णके आभूषणमें जड़नेके योग्य मणि, जो सीसा आदि धातुके आभूषणमें जड़ दिया जाय तो, वह मणि न तो झनकारता है और न शोभाही देता है किन्तु जड़ियेकी बुराई होती है ॥ ७२ ॥ अन्यच्च,— मुकुटे रोपितः काचश्चरणाभरणे मणिः । न हि दोषो मणेरस्ति किंतु साधोरविज्ञता ॥ ७३ ॥ और दूसरे—जो मुकुटमें कांच जड़ दिया जाय, और चरणके आभूषणमें मणि जड़ दिया जाय तो कुछ मणिकी निन्दा नहीं है पर जड़ियेकी मूर्खता समझी जाती है ॥ ७३ ॥ पश्य,— बुद्धिमाननुरक्तोऽयमयं शूर इतो भयम् । इति भृत्यविचारज्ञो भृत्यैरापूर्यते नृपः ॥ ७४ ॥ देखो—यह बुद्धिमान् है, यह राजभक्त है, यह शूर है, इससे भय है, इस प्रकार सेवकोंके विचारको जानने वाला राजा सेवकोंसे भरा पूरा रहता है ॥ ७४ ॥ तथा हि,— अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च । पुरुषविशेषं प्राप्य हि भवन्ति योग्या अयोग्याश्च ॥ ७५ ॥ और भी कहा है—घोड़ा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, मनुष्य और स्त्री ये गुणीके अथवा गुणहीनके पास पहुंचते ही ( उसके संसर्गसे ) योग्य और अयोग्य बन जाते हैं ॥ ७५ ॥ अन्यच्च,— किं भक्तेनासमर्थेन किं शक्तेनापकारिणा ? । भक्तं शक्तं च मां राजन्नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ ७६ ॥