हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context११६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८९- ततो राज्ञा तस्यै धनं दत्तम्। कुट्टन्या च मण्डलं कृत्वा तत्र गणेशादिपूजागौरवं दर्शयित्वा स्वयं वानरप्रियफलान्यादाय वनं प्रविश्य फलान्याकीर्णानि। ततो घण्टां परित्यज्य वानराः फलासक्ता बभूवुः। कुट्टनी च घण्टां गृहीत्वा नगरमागता सर्वजनपूज्याऽभवत्। अतोऽहं ब्रवीमि- "शब्दमात्रान्न भेत- व्यम्" इत्यादि ॥' ततः संजीवक आनीय दर्शनं कारितः। पश्चात्त- त्रैव परमप्रीत्या निवसति। श्रीपर्वतके बीचमें एक ब्रह्मपुर नाम नगर था। उसके शिखर पर एक घंटाकर्ण नाम राक्षस रहता था, यह मनुष्योंसे उड़ती हुई खबर सुनी जाती है। एक दिन घंटेको ले कर भागते हुये किसी चोरको व्याघ्रने मार डाला, और उसके हाथसे गिरा हुआ घंटा बंदरोंको मिला। बंदर उस घंटेको वार वार बजाते थे, तब नगरवासियोंने देखा कि वह मनुष्य खा लिया गया और प्रतिक्षणमें घंटेका बजना सुनाई देता है। तब सब नागरिक लोग "घंटाकर्ण क्रोधसे मनुष्योंको खाता है और घंटेको बजाता है-" यह कह कर नगरसे भाग चले। बाद कराला नाम कुटनीने विचार किया कि यह घंटेका शब्द विना अवसरका है; इसलिये क्या बन्दर घंटेको बजाते हैं? इस बातको अपने आप जान कर राजासे कहा-'जो कुछ धन खर्च करो तो मैं इस घंटाकर्ण राक्षसको वशमें कर लूं।' फिर राजाने उसे धन दिया, और कुटनीने मंडल बनाया और उसमें गणेश आदिकी पूजाका चमत्कार दिखला कर और बन्दरोंको अच्छे लगने वाले फल ला कर वनमें उनको फैला दिया। फिर बन्दर घंटेको छोड़ कर फल खाने लग गये। और कुटनी घंटेको ले कर नगरमें आई और सब जनोंने उसका आदर किया। इसलिये मैं कहता हूं "केवल शब्दसेही नहीं डरना चाहिये" इत्यादि'। फिर संजीवकको ला कर दर्शन कराया। पीछे वह वहांही बड़ी प्रीतिसे रहने लगा ॥ अथ कदाचित्तस्य सिंहस्य भ्राता स्तब्धकर्णनामा सिंहः समा- गतः। तस्यातिथ्यं कृत्वा समुपवेश्य पिङ्गलकस्तदाहाराय पशुं हन्तुं चलितः। अत्रान्तरे संजीवको वदति-'देव ! अद्य हतमृगाणां मांसानि क्व?'। राजाह-'दमनक-करटकौ जानीतः'। संजीवको ब्रूते-'ज्ञायतां किमस्ति नास्ति वा।' सिंहो विमृश्याह-'नास्त्येव