BharatKosha
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

Page 139 of 302

Read in context
Page 139

-१०१] अनुचित और उचित मंत्रिका लक्षण ११९ ब्राह्मणः क्षत्रियो बन्धुर्नाधिकारे प्रशस्यते । ब्राह्मणः सिद्धमप्यर्थं कृच्छ्रेणापि न यच्छति ॥ ९६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, और भाई (या आप) इनको अधिकार पर लगाना अच्छा नहीं । क्योंकि ब्राह्मण शीघ्र सिद्ध होनेवाले प्रयोजनको राजाके आग्रहको जान कर कठिनतासे भी नहीं करता है ॥ ९६ ॥ नियुक्तः क्षत्रियो द्रव्ये खड्गं दर्शयते ध्रुवम् । सर्वस्वं ग्रसते बन्धुराक्रम्य ज्ञातिभावतः ॥ ९७ ॥ जो क्षत्रियको धनके काम पर रक्खे तो निश्चय करके राज्य छिन लेनेकी इच्छासे तरवार दिखलाने लगता है, और बान्धव ज्ञातिके कारण घेर कर सब धन हर लेता है ॥ ९७ ॥ अपराधेऽपि निःशङ्को नियोगी चिरसेवकः । स स्वामिनमवज्ञाय चरेच्च निरवग्रहः ॥ ९८ ॥ पुराना सेवक अपराध करने पर भी निर्भय रहता है और स्वामीकी अवज्ञा करके बिना रोकटोक काम करता है ॥ ९८ ॥ उपकर्ताऽधिकारस्थः स्वापराधं न मन्यते । उपकारं ध्वजीकृत्य सर्वमेवावलुम्पति ॥ ९९ ॥ उपकार करनेवाला अधिकार पर बैठ कर अपने अपराधको नहीं मानता है और उपकारको आगे करके सब दोषोंको छुपा देता है ॥ ९९ ॥ उपांशुक्रीडितोऽमात्यः स्वयं राजायते यतः । अवज्ञा क्रियते तेन सदा परिचयाद्ध्रुवम् ॥ १०० ॥ मंत्री सब गुप्त बातोंको जाननेवाला होता है कि जिससे आप राजा कैसे आचरण करता है और वह पास रहनेसे निश्चय स्वामीका अनादर करता है ॥ १०० ॥ अन्तर्दुष्टः क्षमायुक्तः सर्वानर्थकरः किल । शकुनिः शकटारश्च दृष्टान्तावत्र भूपते ! ॥ १०१ ॥ हे राजा ! भीतरका दुष्ट अर्थात् पीठ पीछे काम बिगाडनेवाला और सहनशील अर्थात् सामने हित दिखानेवाला मंत्री निश्चय करके सब अनर्थोंका करनेवाला होता है। इस विषयमें शकुनि और शंकटार ये दो दृष्टान्त हैं ॥ १०१ ॥ १ दुर्योधनका मामा जो मंत्रीके पद पर काम करता था, २ राजा महानंदका मंत्री.

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 139 of 302 · BharatKosha