हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-१११] ग्वालाने स्त्री समझ कर नायनका नाक काटना १२५
जैसा कहा है—चन्द्रमासे रातमें अंधकार दूर होने पर कामदेवने देख देख कर युवाओंके चित्तोंको व्याकुल किया ॥ १११ ॥ तस्य तादृशीमवस्थामवलोक्य परिक्लिष्टमनास्त्वामनुवर्तितुमा- गता । तदहमत्रात्मानं बद्धा तिष्ठामि । त्वं तत्र गत्वा तं संतोष्य सत्वरमागमिष्यसि । तथाऽनुष्ठिते सति स गोपः प्रबुद्धोऽवदत्- 'इदानीं त्वां पापिष्ठां जारान्तिकं नयामि' । ततो यदासौ न किंचिदपि ब्रूते तदा क्रुद्धो गोपः 'दर्पान्मम वचसि प्रत्युत्तरमपि न ददासि ?' इत्युक्त्वा कोपेन तेन कर्तिकामादायास्या नासिका छिन्ना । तथा कृत्वा पुनः सुप्तो गोपो निद्रामुपगतः । अथागत्य गोपी दूतीमपृच्छत्—'का वार्ता ?' । दूत्योक्तम्—'पश्य माम् । मुखमेव वार्तां कथयति ।' अनन्तरं सा गोपी तथा कृत्वोत्मानं बद्ध्वा स्थिता इयं च दूती तां छिन्ननासिकां गृहीत्वा स्वगृहं प्रविश्य स्थिता । ततः प्रातरेवानेन नापितेन स्ववधूः क्षुरभाण्डं याचिता सती क्षुरमेकं प्रादात् । ततोऽसमग्रभाण्डे प्राप्ते समुपजातको- पोऽयं नापितस्तं क्षुरं दूरादेव गृहे क्षिप्तवान् ॥ अथ कृतार्तरावेयं विनापराधेन मे नासिकाऽनेन छिन्नेत्युक्त्वा धर्माधिकारिसमीप- मेनमानीतवती ॥ सा च गोपी तेन गोपेन पुनः पृष्टोवाच—'अरे पाप ! को मां महासतीं निरूपयितुं समर्थः ? मम व्यवहारम- कल्मषमष्टौ लोकपाला एव जानन्ति । उसकी वैसी दशा देख कर मनमें घबराई हुई तेरी अनुवर्तिनी (एवजी) करने आई हूं । इसलिये मैं यहां अपनेको बांध कर रहती हूं । तू वहां जा कर उसको संतुष्ट कर—शीघ्र लौट आइयो' । ऐसा कहने पर वह ग्वाला जाग कर कहने लगा-'अब तुझ पापिनको तेरे यारके पास ले चलूं।' फिर जब यह कुछ न बोली तब ग्वाला झुंझलाया । 'घमंडसे मेरी बातका उत्तरभी नहीं देती है ?' यह कह कर क्रोधसे उसने छुरी निकाल, उसकी नाक काट डाली । वैसा करके ग्वाला फिर सो गया, और उसे निद्रा आ गई । फिर ग्वालिनने आ कर दूतीसे पूछा— 'क्या बात है ?' दूतीने कहा-'मुझे देख ले, मुखही बात कह देता है।' फिर वह ग्वालिन वैसेही करके आप अपनेको बांध कर ठहरी रही, और वह दूती उस कटी हुई नाकको ले कर अपने घरमें घुस कर बैठी रही । फिर प्रातःकाल होतेही