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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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-११३] दूती और ग्वालिनको देशनिकालकी शिक्षा १२७ अनन्तरं तेन सा दूती गोपी च ग्रामाद्बहिर्निःसारिते । नापितश्च गृहं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि–“स्वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा” इत्यादि ॥ अथ स्वयं कृतोऽयं दोषः । अत्र विलापं नोचितम् । (क्षणं विमृश्य ।) मित्र ! यथाऽनयोः सौहार्दं मया कारितं तथा मित्रभेदोऽपि मया कार्यः । जो मैं सच्ची पतिव्रता होऊं, तुझे छोड़ दूसरेको न जानती होऊं, दूसरे पुरुषको खप्नमेंभी न भजती होऊं तो उस पातिव्रत्य धर्मसे मेरी कटी हुई नाकभी बिना कटी हो जाय. मैं तुझे भस्म कर सकती हूं, परन्तु तू पति है, संसारके भयसे डरती हूं। मेरा मुख देख । 'फिर जब उस ग्वालेने दिया जला कर उसका मुख देखा तभी उसका नाकसमेत मुख देख कर उसके चरणोंमें गिर पड़ा–‘मुझे धन्य है कि जिसकी ऐसी पतिव्रता स्त्री है ॥ और यह दूसरा जो बनिया है उसका वृत्तान्तभी कहता हूं। यह अपने घरसे निकल कर बारह बरसमें मलया- चलके पास इस नगरीमें आया, यहां वेश्याके घरमें सोया; उस कुट्टनीके घरके द्वार पर बैठाये गये काठके बने हुए वेतालके सिरमें एक अनमोल रत्न था. वहां इस लोभी बनियेने रातको उठ कर रत्न लेनेका यत्न किया. तब उस पिशाचने सूतसे चलाई गई भुजाओंसे उसे खींचा और वह रो कर चिल्लाया. पीछे उठ कर कुट्टनीने कहा–‘हे पुत्र ! तू मलयके पाससे आया है। इसलिये सब रत्न इसे दे दे. नहीं तो तू इससे नहीं छुटेगा; यह सेवक ऐसाही है’. तब इसने सब रत्न दे दिये. और इस प्रकार यह सर्वस्व खो कर हमारे साथ आ कर मिल गया । यह सब सुन कर राजपुरुषोंने न्याय करनेके लिये धर्माधिकारीको प्रवृत्त कर दिया; फिर उसने उस दूती और ग्वालिनको देसनिकाला दे दिया ॥ और नाईभी घर गया। इसलिये मैं कहता हूं–“स्वर्णरेखाको मैंने छू कर” इत्यादि ॥ और यह अपनाही किया दोष है। इसमें विलाप करना उचित नहीं है । (क्षणभर जीमें विचार कर) हे मित्र ! जैसे मैंने इन दोनोंकी मित्रता कराई थी वैसेही मित्रोंमें फूट भी कराऊंगा. यतः,— अतथ्यान्यपि तथ्यानि दर्शयन्त्यतिपेशलाः । समे निम्नोन्नतानीव चित्रकर्मविदो जनाः ॥ ११३ ॥