BharatKosha
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

Page 160 of 302

Read in context
Page 160

१४० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १४५- प्रकाशं ब्रूते—'तदा संजीवकः किं प्रत्यादिश्यताम् ?'। दमनकः ससंभ्रममाह—'देव ! मा मैवम् । एतावता मन्त्रभेदो जायते । ( प्रकट बोला ) तो संजीवकको क्या उपदेश करना चाहिये ?' दमनकने घबरा कर कहा-'महाराज ! ऐसा नहीं; इससे गुप्त बात खुल जाती है ॥ तथा ह्युक्तम्,— मन्त्रबीजमिदं गुप्तं रक्षणीयं यथा तथा । मनागपि न भिद्येत तद्भिन्नं न प्ररोहति ॥ १४५ ॥ औरभी कहा है—इस गुप्त मंत्ररूपी बीजकी जिस किसी प्रकारसे रक्षा करे और थोड़ाभी न फूटने दे, क्योंकि वह फूटा हुआ नहीं उगता है, अर्थात् रहस्यको गुप्त रक्खे; क्योंकि वह खोलनेसे सफल ( कार्य-साधक ) नहीं होता है ॥१४५॥ किंच,— आदेयस्य प्रदेयस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः । क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥ १४६ ॥ और लेना देना और करनेका काम ये शीघ्र नहीं किये जायँ तो इनका रस समय पी लेता है, अर्थात् समय पर चूक जानेसे काम बिगाड़ जाता है ॥१४६॥ तदवश्यं समारब्धं महता प्रयत्नेन संपादनीयम् । इसलिये अवश्य आरंभ किये हुए कामको बड़े यत्नसे सिद्ध करना चाहिये. किंच,— मन्त्रो योध इवाधीरः सर्वाङ्गैः संवृतैरपि । चिरं न सहते स्थातुं परेभ्यो भेदशङ्कया ॥ १४७ ॥ क्योंकि,—जैसे कवच आदिसे ढंके हुए अंग वाला भी डरपोक योद्धा पराजयके भयसे युद्धमें बहुत देर तक नहीं ठहर सकता है वैसेही उपाय आदि सब अंगोंसे गुप्त विचार भी दूसरे शत्रुओंके भेदकी शंकासे बहुत काल तक गुप्त नहीं रहता है, अर्थात् प्रकट हो जाता है, और रहस्यके खुल जाने पर कार्यहानि होती है ॥ १४७ ॥ यद्यसौ दृष्टदोषोऽपि दोषान्निवर्त्य संधातव्यस्तदतीवानुचितम् । जो इसका दोष देख लेने पर भी दोषको दूर कर फिर मेल करना तो औरभी अनुचित है;