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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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[page-header] १६० हितोपदेशः [ विग्रहः ९- [/page-header]

काण्डं सज्जीकृत्यानतकायेनैकान्ते स्थितम् । तं च दूराद्दृष्ट्वा गर्दभः पुष्टाङ्गो यथेष्टसस्यभक्षणजातबलो गर्दभोऽयमिति मत्वोच्चैः शब्दं कुर्वाणस्तदभिमुखं धावितः । सस्यरक्षकेण चीत्कारशब्दा- न्निश्चित्य गर्दभोऽयमिति लीलयैव व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि—"सुचिरं हि चरन्नित्यम्" इत्यादि' ॥ दीर्घमुखो ब्रूते— ततः पक्षिभिरुक्तम्—'अरे पाप दुष्ट बक ! अस्माकं भूमौ चरन्नस्माकं स्वामिनमधिक्षिपसि ? तन्न क्षन्तव्यमिदानीम्' इत्युक्त्वा सर्वे मां चक्षुभिर्हत्वा सकोपा ऊचुः—'पश्य रे मूर्ख ! स हंसस्तव राजा सर्वथा मृदुः। तस्य राज्याधिकारो नास्ति । यत एकान्तमृदुः करतलस्थमप्यर्थं रक्षितुमक्षमः स कथं पृथिवीं शास्ति ? राज्यं वा तस्य किम् ? किंतु त्वं च कूपमण्डूकः । तेन तदाश्रयमुपदिशसि ।

‘हस्तिनापुरमें एक विलास नाम धोबी रहता था । उसका गधा अधिक बोझ ढौनेसे दुबला मरासू-सा हो गया था । फिर उस धोबीने इसे बाघकी खाल ओढ़ा कर वनके पास नाजके खेतमें रख दिया । फिर दूरसे उसे देख कर और बाघ समझ, खेत वाले शीघ्र भाग जाते थे । इसके अनन्तर एक दिन कोई खेतका रखवाला धूसर रंगका कंबल ओढ़े हुए धनुष बाण चढ़ा कर शरीरको नौढ़ा कर एकांतमें बैठ गया । उधर मन माना अन्न चरनेसे बलवान्, तथा संड़याया हुआ गधा उसे देख कर और गधा जान कर ढेंचू ढेंचू खरसे रेंकता हुआ उसके सामने दौड़ा । तब खेतवालेने, रेंकनेके शब्दसे इसको गधा निश्चय करके सहजमेंही मार डाला। इसलिये मैं कहता हूँ-“बहुत काल तक चरता हुआ” इत्यादि । दीर्घमुख बोला-फिर पक्षियोंने कहा-‘अरे पापी दुष्ट बगुले ! तू हमारी भूमिमें चुग कर हमारेही स्वामीकी निन्दा करता है ? इसलिये अब क्षमा करनेके योग्य नहीं है ।' यह कह कर सब मुझे चोंचोंसे मार कर क्रोधसे बोले-‘अरे मूर्ख ! देख, वह हंस तेरा राजा सब प्रकारसे भोला है, उसको राज्यका अधिकार नहीं है । क्योंकि निरा भोला हथेली पर धरे हुए धनकीभी रक्षा नहीं कर सकता है । वह कैसे पृथ्वीका राज्य करता है ? अथवा उसका राज्यही क्या है ? वरन तूभी कुएका मैंडक है । इसलिये उसके आश्रयका उपदेश करता है ।