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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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१६६ हितोपदेशः [ विग्रहः १९- जा कर तयार कर।' तब मैंने कहा—'अपने दूतकोभी भेजिये।' राजाने कहा- 'दूत बन कर कौन जायगा ? क्योंकि ऐसा दूत करना चाहिये;— भक्तो गुणी शुचिर्दक्षः प्रगल्भोऽव्यसनी क्षमी । ब्राह्मणः परमर्मज्ञो दूतः स्यात्प्रतिभानवान्' ॥ १९ ॥ भक्त अर्थात् राजाका हितकारी, गुणवान्, शुद्ध अर्थात् उत्कोच (रिशबत) आदि लाभरहित, कार्यमें चतुर, बोल-चालमें निपुण, द्यूत, पान आदि व्यसनसे रहित, क्षमाशील, ब्राह्मण, शत्रुके भेदको जानने वाला और बुद्धिमान् दूत होना चाहिये ॥ १९ ॥ गृध्रो वदति—'सन्त्येव दूता बहवः । किंतु ब्राह्मण एव कर्तव्यः । सिद्ध बोला—'दूत तो बहुतसे हैं परन्तु ब्राह्मणकोही करना चाहिये । यतः,— प्रसादं कुरुते पत्युः संपत्तिं नाभिवाञ्छति । कालिमा कालकूटस्य नापैतीश्वरसंगमात्' ॥ २० ॥ क्योंकि-वह स्वामीको प्रसन्न करता है और संपत्तिको नहीं चाहता है, और जैसे महादेवजीके संगसे विषका कालापन नहीं जाता है वैसेही इसकीभी प्रकृति नहीं बदलती है ॥ २० ॥ राजाह—'ततः शुक एव व्रजतु । शुक ! त्वमेवानेन सह गत्वा- स्मदभिलषितं ब्रूहि ।' शुको ब्रूते—'यथाज्ञापयति देवः । किन्त्वयं दुर्जनो बकः । तदनेन सह न गच्छामि ॥ राजा बोला-'फिर तोताही जाय; हे तोते ! तूही इसके साथ वहाँ जा कर हमारा इष्ट (संदेशा) कह दे।' तोता बोला—'जो आज्ञा श्रीममहाराजकी । पर यह बगुला दुष्ट है। इसलिये इसके साथ नहीं जाऊँगा। तथा चोक्तम्,— खलः करोति दुर्वृत्तं नूनं फलति साधुषु । दशाननोऽहरत्सीतां बन्धनं स्यान्महोदधेः ॥ २१ ॥ जैसा कहा है—दुष्ट जो बुराई करता है वह बुराई सचमुच साधुओं पर फलती (असर करती) है, अर्थात् उन्हें दुःख भुगतना पड़ता है। जैसे रावण सीताको हर ले गया पर समुद्र बाँधा गया ॥ २१ ॥

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