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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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  • ३४ ] राजाको भेदियेकी आवश्यकता १७३ क्योंकि—रंग, रूप, चेष्टा, खर, नेत्र और मुख इनके बदलनेसे चतुर मनुष्य मनकीभी बात जान लेते हैं इसलिये एकांतमें गुप्त वार्ता करनी चाहिये ॥ ३२ ॥ राजा मन्त्री च तत्र स्थितौ । अन्येऽन्यत्र गताः । चक्रवाको ब्रूते—'देव ! अहमेवं जानामि । कस्याप्यस्मन्नियोगिनः प्रेरणया बकेनेदमनुष्ठितम् । राजा और मंत्री वहाँ रहे । और सब दूसरे स्थानको चले गये । चक्रवा बोला—'हे महाराज ! मैं ऐसा जानता हूं कि किसी हमारेही सेवकके सिखाये भलायेसे बगुलेने यह किया है । यतः,— वैद्यानामातुरः श्रेयान् व्यसनी यो नियोगिनाम् । विदुषां जीवनं मूर्खः सद्वर्णो जीवनं सताम्' ॥ ३३ ॥ क्योंकि—वैद्योंको रोगी लाभदायक है, सेवकोंको द्यूतपानादि व्यसनसे युक्त राजा कल्याणकारी है, पंडितोंका मूर्ख जीवन है, अर्थात् आजीविका देने वाला है, और सत्पुरुषोंका जीवन उत्तम वर्ण है' ॥ ३३ ॥ राजाऽब्रवीत्—'भवतु । कारणमत्र पश्चान्निरूपणीयम् । संप्रति यत्कर्तव्यं तन्निरूप्यताम् ।' चक्रवाको ब्रूते—'देव ! प्रणिधिस्ताव- त्प्रहीयताम् । ततस्तदनुष्ठानं बलाबलं च जानीमः । राजा बोला—'जो कुछ हो, इसमें जो कारण है उसका पीछे निश्चय कर लिया जायगा, अब जो कुछ करना है उसका निर्णय करो ।' चक्रवा बोला—'हे महाराज ! पहले किसी भेदियेको भेजिये, फिर उसका काम और बलाबल जानें । तथा हि,— भवेत्स्वपरराष्ट्राणां कार्याकार्यावलोकने । चारचक्षुर्महीभर्तुर्यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥ ३४ ॥ वैसा कहा है—राजाओंका अपने, तथा शत्रुके राज्योंके, अच्छे तथा बुरे कामोंके देखनेके लिये भेदियाही नेत्र ( गूढ मन्त्र जानने वाला ) होता है और जिसके नहीं होता है वह सचमुच अंधाही है ॥ ३४ ॥ स च द्वितीयं विश्वासपात्रं गृहीत्वा यातु । तेनासौ स्वयं तत्रावस्थाय द्वितीयं तत्रत्यमन्त्रकार्यं सुनिभृतं निश्चित्य निगत्य प्रस्थापयति ।