हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-५८] जातिफूटसे नीलवर्ण सियारकी मृत्यु १८१
तद्यथायं परिचितो भवति तथा कुरुत । तत्र चैवमनुष्ठेयम्- यतः सर्वे संध्यासमये संनिधाने महारावमेकदैव करिष्यथ । ततस्तं शब्दमाकर्ण्य जातिस्वभावात्तेनापि शब्दः कर्तव्यः ।' ततस्तथानुष्ठिते सति तद्वृत्तम् । एक समय वनमें कोई गीदड़ अपनी इच्छासे नगरके पास घूमते घूमते नीलके हौदमें गिर गया । पीछे उसमेंसे निकल नहीं सका; प्रातःकाल अपनेको मरेके समान दिखला कर बैठ गया । फिर नीलके हौदके स्वामीने उसे मरा हुआ जान कर और उसमेंसे निकाल कर दूर ले जा कर फेंक दिया और वहाँसे वह भाग गया । तब उसने वनमें जा कर और अपनी देहको नीले रंगकी देख कर विचार किया—'मैं अब उत्तम वर्ण हो गया हूं, तो मैं अपनी प्रभुता क्यों न करूं ? यह सोच कर सियारोंको बुला कर, उसने कहा—'श्रीभगवती वनकी देवीजीने अपने हाथसे वनके राज्य पर सब ओषधियोंके रससे मेरा राजतिलक किया है, इसलिये आजसे ले कर मेरी आज्ञासे काम करना चाहिये।' अन्य सियार भी उसको अच्छा वर्ण देख कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करके बोले-'जो महाराजकी आज्ञा।' इसी प्रकारसे क्रम क्रमसे सब वनवासियोंमें उसका राज्य फैल गया । फिर उसने अपनी जातसे चारों ओर बैठा कर अपना अधिकार फैलाया, पीछे उसने व्याघ्र सिंह आदि उत्तम मंत्रियोंको पा कर सभामें सियारोंको देख कर लाजके मारे अनादरसे सब अपने जातभाइयोंको दूर कर दिया । फिर सियारोंको विकल देख कर किसी बूढ़े सियारने यह प्रतिज्ञा की कि 'तुम खेद मत करो । जैसे इस मूर्खने नीति तथा भेदके जानने वाले हम सभीका अपने पाससे अनादर किया है वैसेही जिस प्रकार यह नष्ट हो सो करना चाहिये । क्योंकि ये बाघ आदि, केवल रंगसे धोखेमें आ गये हैं और सियार न जान कर इसको राजा मान रहे हैं । जिससे इसका भेद खुल जाय सो करो । और ऐसा करना चाहिये कि संध्याके समय उसके पास सभी एक साथ चिल्लाओ । फिर उस शब्दको सुन कर अपने जातिके स्वभावसे वहभी चिल्लाते उठेगा।' फिर वैसा करने पर वही हुआ अर्थात् उसकी पोल खुल गई; यतः,— यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः । श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्नात्युपानहम् ? ॥ ५८ ॥