हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-६३ ] दूतका कर्तव्य और प्रशंसा १८३ 'देव ! आज्ञापय । हन्मि दुष्टं शुकम् ।' सर्वज्ञो राजानं काकं च सान्त्वयन्ब्रूते—'शृणु तावत् । तब सभा करके तोते और कागको बुलाया । तोता कुछ ऊँचा शिर करके दिये हुए आसन पर बैठ कर बोला-'हे हिरण्यगर्भ ! महाराजाधिराज श्रीमान् चित्रवर्णने आपको अच्छी भाँति आज्ञा दी है—'जो तुम्हें अपने प्राणोंसे या लक्ष्मीसे प्रयोजन है, तो शीघ्र आ कर हमारे चरणोंको प्रणाम करो । नहीं तो दूसरे स्थानमें रहनेके लिये विचार करो ।' राजाने झुँझला कर कहा-'अरे ! कोई हमारे सामने नहीं है जो इसको गला पकड़ कर निकाले ?' मेघवर्ण (कौवा) उठ कर बोला-'महाराज ! आज्ञा कीजिये-दुष्ट तोतेको मार डालूँ । सर्वज्ञ (चकवा) राजा और कौएको शांत करता हुआ बोला-'पहले सुन लीजिये- न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् । धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६१ ॥ जिसमें वृद्ध पुरुष नहीं हैं वह सभा नहीं कहलाती है, जो धर्मको न कहे वे वृद्ध नहीं हैं, जिसमें सत्य नहीं है वह धर्म नहीं है, और वह सत्य नहीं है जो छलसे युक्त है ॥ ६१ ॥ यतो धर्मश्चैषः,— क्योंकि (सच्चा) धर्म यह है— दूतो म्लेच्छोऽप्यवध्यः स्याद्राजा दूतमुखो यतः । उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु दूतो वदति नान्यथा ॥ ६२ ॥ दूत हीनजातिका भी हो पर मारनेके योग्य नहीं होता है, क्योंकि राजाका दूतही मुख है कि जो शस्त्रोंके उठाने परभी विपरीत नहीं कहता है ॥ ६२ ॥ किं च,— स्वापकर्षं परोत्कर्षं दूतोक्तैर्मन्यते तु कः ? । सदैवावध्यभावेन दूतः सर्वं हि जल्पति' ॥ ६३ ॥ और दूतकी बातोंसे अपनी लघुता और शत्रुको अधिकता कौन मानता है ? दूत तो सदा 'मैं नहीं मारा जाऊंगा' इस भावनासे सभी कुछ कहता है ॥ ६३॥