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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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१८८ हितोपदेशः [ विग्रहः ८०- आपसमें मिल कर लड़ना चाहिये और एकको दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये और जो कुछ बलहीन सेना है उसे सेना(व्यूह)के बीचमें कर देनी चाहिये ॥ पदातींश्च महीपालः पुरोऽनीकस्य योजयेत् । उपरुध्यारिमासीत राष्ट्रं चास्योपपीडयेत् ॥ ८० ॥ राजा, सेनाके आगे पैदल सेनाको रक्खे, जिससे वह वैरीको घेरे रहे और उसके राज्यमें लूट मार करे ॥ ८० ॥ स्यन्दनाश्वैः समे युध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा । वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्मायुधैः स्थले ॥ ८१ ॥ एक-सी भूमिमें रथ और घोड़ोंसे, जलयुक्त स्थानमें नाव और हाथियोंसे, वृक्ष अथवा झाड़ियोंसे ढँके हुए स्थानमें धनुष-बाणोंसे, और पटपड़में खङ्ग आदि आयु- धोंसे लड़ना चाहिये ॥ ८१ ॥ दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् । भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारान्परिखांस्तथा ॥ ८२ ॥ शत्रुके घास, अन्न, जल, तथा इन्धनका नाश कर दे और सरोवर, परकोटे तथा खाईको तोड़ देना चाहिये ॥ ८२ ॥ बलेषु प्रमुखो हस्ती न तथाऽन्यो महीपतेः । निजैरवयवैरेव मातङ्गोऽष्टायुधः स्मृतः ॥ ८३ ॥ राजाकी सेनामें जैसा हाथी सबसे श्रेष्ठ है वैसे घोड़े आदि नहीं हैं, क्योंकि हाथी अपने (चार पैर, दो दाँत, एक सूंड और एक पूँछ, इन आठ ) अंगोंसे 'अष्टायुध' कहाता है; अर्थात् उन आठही अवयवोंसे काम देनेसे हाथी सबसे श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ८३ ॥ बलमश्वस्य सैन्यानां प्राकारो जङ्गमो यतः । तस्मादश्वाधिको राजा विजयी स्थलविग्रहे ॥ ८४ ॥ और सेनाओंके बीचमें घोड़ेकी सेना चलने वाला परकोटा है इसलिये जिस राजाके पास बहुत घोड़े हैं वह स्थलयुद्ध ( पटपड़ भूमिके युद्ध ) में जीतने वाला होता है ॥ ८४ ॥ तथा चोक्तम्,— युध्यमाना हयारूढा देवानामपि दुर्जयाः । अपि दूरस्थितास्तेषां वैरिणो हस्तवर्तिनः ॥ ८५ ॥

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