हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context२०२ हितोपदेशः [ विग्रहः ११६- किं च,— न साहसैकान्तरसानुवर्तिना न चाप्युपायोपहतान्तरात्मना । विभूतयः शक्यमवाप्तुमूर्जिता नये च शौर्ये च वसन्ति संपदः ॥ ११६ ॥ और ( बुराई भलाईको विना विचार कर ) केवल साहस करने वाला, और उपायसे उपहत चित्तवाला, अधिक ऐश्वर्यको नहीं पा सकता है, क्योंकि जहां पर नीति और शूरता रहती है वहां ही संपत्तियाँ रहती हैं ॥ ११६ ॥ त्वया स्वबलोत्साहमवलोक्य साहसैकवासिना मयोपन्यस्ते- ष्वपि मन्त्रेष्वनवधानं वाक्पारुष्यं च कृतम् । अतो दुर्नीतेः फलमिदमनुभूयते । और केवल साहस पर भरोसा करने वाले, आपने अपनी सेनाके उत्साहको देख कर मेरे किये उपदेशों पर ध्यान नहीं दिया था और कठोर वचन कहे थे उसी कटु नीतिका फल भोग रहे हो । तथा चोक्तम्,— दुर्मन्त्रिणं किमुपयन्ति न नीतिदोषाः संतापयन्ति कमपथ्यभुजं न रोगाः ? । कं श्रीर्न दर्पयति कं न निहन्ति मृत्युः कं स्त्रीकृता न विषयाः परितापयन्ति ? ॥ ११७ ॥ नीतिके दोष किस बुरे मंत्रीमें नहीं होते हैं ? किसको अपथ्य ( अहितकर वस्तुएँ ) खाने पर रोग नहीं पीड़ा देते हैं ? लक्ष्मी किस मनुष्यको अभिमानी नहीं करती है ? मृत्यु किसको नहीं मारती है और स्त्रीके किये हुए दुराचार किस पुरुषको दुःख नहीं देते हैं ? ॥ ११७ ॥ अपरं च,— मुदं विषादः शरदं हिमागम- स्तमो विवस्वान् सुकृतं कृतघ्नता । प्रियोपपत्तिः शुचमापदं नयः श्रियः समृद्धा अपि हन्ति दुर्नयः ॥ ११८ ॥