हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-१३८ ] गढ़ जीतनेके उपायका कथन २०९ पीछे उन सभीने गढ़के द्वार पर जा कर बड़ा घनघोर युद्ध किया । दूसरे दिन राजा चित्रवर्णगिद्धसे बोला—'प्यारे ! अब अपनी प्रतिज्ञाका पालन कर ।' गिद्ध बोला—'महाराज ! पहले सुन लीजिये, — अकालसहमत्यल्पं मूर्खव्यसनिनायकम् । अगुप्तं भीरुयोद्धं च दुर्गव्यसनमुच्यते ॥ १३७ ॥ बहुत काल तक घेरा न सहने वाला अर्थात् कच्चा, अत्यंत स्वल्प सैन्य- युक्त, मूर्ख और मद्यपानादि दोषयुक्त नायक जिसका हो, जिसकी अच्छे प्रकारसे रक्षा नहीं की गई हो और जिसमें कायर और डरपोक योद्धा हों वह गढ़की विपत्ति कही गई है ॥ १३७ ॥ तत्तावदत्र नास्ति । सो बात तो यहाँ नहीं है । उपजापश्चिरारोधोऽवस्कन्दस्तीव्रपौरुषम् । दुर्गस्य लङ्घनोपायाश्चत्वारः कथिता इमे ॥ १३८ ॥ गढ़की भीतरी सेनामें किसी भेदियेको भेज कर फूट करा देना, बहुत काल तक चारों ओरसे घेरे पड़े रहना, बार बार शत्रु पर चढ़ाई करना और अत्यन्त साहस दिखलाना ये चार गढ़के जीतनेके उपाय हैं ॥ १३८ ॥ अत्र यथाशक्ति क्रियते यत्नः ( कर्णे कथयति । ) एवमेवम् ।' ततोऽनुदित एव भास्करे चतुर्ष्वपि दुर्गद्वारेषु वृत्ते युद्धे दुर्गा- भ्यन्तरगृहेष्वेकदा काकैरग्निर्निक्षिप्तः । ततः 'गृहीतं गृहीतं दुर्गम्' इति कोलाहलं श्रुत्वा सर्वतः प्रदीप्ताग्निमवलोक्य राजहंस- सैनिका दुर्गवासिनश्च सत्वरं हृदं प्रविष्टाः । इसमें शक्तिके अनुसार उपाय किया जाता है। (कानमें कहने लगा) इस प्रकार इस प्रकार ।' फिर एक दिन सूर्यके विना ही निकले गढ़के चारों द्वारों पर घनघोर युद्ध होने पर गढ़के भीतरके डेरोंमें कौओंने आग लगा दी । फिर तो “गढ़को ले लिया ले लिया” यह हुर्रा सुन कर चारों ओर आगको धधकती हुई देख कर राजहंसकी सेनाके शूर वीर और गढ़के रहने वाले शीघ्र सरोवरमें घुस गये । हि० १४