हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in contextभूमिका विदित हो कि नीति एक ऐसा शास्त्र है कि जिसको मनुष्यमात्र व्यवहार में लाता है, क्योंकि बिना इसके संसार में सुखपूर्वक निर्वाह नहीं हो सकता, और यदि नीति का अवलम्बन न किया जाय तो मनुष्य को सांसारिक अनेक घटनाओं के अनुकूल कृतकार्य होने में बड़ी कठिनता पड़े, और जो लोग नीति के जानने वाले हैं वे बड़े बड़े दुस्तर और कठिन कार्यों को सहज में शीघ्र कर लेते हैं; परन्तु नीतिहीन मनुष्य छोटे छोटे-से कार्यों में भी मुग्ध हो कर हानि उठाते हैं । नीति दो प्रकारकी है-एक धर्म, दूसरी राजनीति; और इन दोनों नीतियों के लिये भारतवर्ष प्राचीन समय से सुप्रसिद्ध है । सर्वसाधारण को राजनीति से प्रतिदिन काम पड़ता है । अत एव विदेशी विद्वानों ने भारत में आ कर नीतिविद्या सीख ली और अपने देशों में जा कर उसका अनुकरण किया और अपनी अपनी मातृ- भाषा में उसका अनुवाद कर के देश को लाभ पहुंचाया ॥ यद्यपि राजनीति के एक से एक अपूर्व ग्रंथ संस्कृत भाषा में पाये जाते हैं तथापि पण्डित विष्णुशर्मारचित पञ्चतन्त्र परम प्रसिद्ध है, क्योंकि उस ग्रंथ में नीतिकथा इस उत्तम प्रणाली से लिखी गई है कि जिसके पढ़ने में रुचि और समझने में सुगमता होती है और अन्य देशियों ने भी इसका बड़ा ही समादर किया कि अरबी, फारसी इत्यादि भाषाओं में इसका अनुवाद पाया जाता है । पण्डित नारा- यणजी ने उक्त पञ्चतन्त्र तथा अन्य अन्य नीति के ग्रन्थों से हितोपदेश नामक एक नवीन ग्रन्थ संगृहीत करके प्रकाशित किया, कि जो