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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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४४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ९३- और देख-दुर्जन मनुष्य मट्टीके घड़ेके समान सहज टूटा जा सकता है और फिर उसका जुड़ना कठिन है. और सजन सोनेके घड़ेके समान है कि कभी टूट नहीं सकता और जो टूटे भी तो शीघ्र जुड़ सकता है ॥ ९२ ॥ किंच,— द्रवत्वात्सर्वलोहानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् । भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां संगतं दर्शनात्सताम् ॥ ९३ ॥ और सोना, चांदी आदि धातुओंका गलानेसे, पशुपक्षियोंका पूर्वजन्मके संस्कारसे, मूर्खोंका भय और लोभसे, और सज्जनोंका केवल दर्शनसेही मेल होता है ॥ ९३ ॥ किंच,— नारिकेलसमाकारा दृश्यन्ते हि सुहृज्जनाः । अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः ॥ ९४ ॥ और सजन पुरुष नारियलके समान बाहरसे दीखते हैं अर्थात ऊपरसे सख्त और भीतरसे मीठे, और दुर्जन बेरफलके आकारके समान बाहरहीसे मनोहर होते हैं ॥ ९४ ॥ स्नेहच्छेदेऽपि साधूनां गुणा नायान्ति विक्रियाम् । भङ्गेऽपि हि मृणालानामनुबध्नन्ति तन्तवः ॥ ९५ ॥ स्नेह टूट जाय तो भी सज्जनोंके गुण नहीं पलटते हैं, जैसे कमलकी डंडीके टूटने परभी उसके तंतु जुड़ेही रहते हैं ॥ ९५ ॥ अन्यच्च,— शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः । दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥ ९६ ॥ और दूसरे-पवित्रता अर्थात् निष्कपटता, दानशीलता, शूरता, सुख-दुःखमें समानता, अनुकूलता, प्रीति और सत्यता ये मित्रोंके गुण हैं ॥ ९६ ॥ एतैर्गुणैरुपैतो भवदन्यो मया कः सुहृत्प्राप्तव्यः ?' इत्यादि तद्वचन- माकर्ण्य हिरण्यको बहिर्निःसृत्याह—'आप्यायितोऽहं भवतामनेन वचनामृतेन । इन गुणोंसे युक्त तुम्हें छोड़ और किसको मित्र पाऊंगा' उसकी ऐसी (मीठी) बातें सुन कर हिरण्यक बाहर निकल कर बोला-'तुम्हारे वचनरूपी अमृतसे मैं तृप्त हुआ;