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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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५४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १२४- फिर कुदाली लाकर उसने बिलको खोद कर मेरा बहुत दिनका इकट्ठा किया हुआ धन ले लिया। उसी दिनसे अपने सामर्थ्यसे हीन, बल और उत्साहसे रहित, अपना आहारभी ढूंढ़नेके अयोग्य, डरके मारे धीरे धीरे चलते हुए मुझको चूड़ाकर्णने देखा ॥ ततस्तेनोक्तम्— 'धनेन बलवाँल्लोके धनाद्भवति पण्डितः । पश्यैनं मूषिकं पापं स्वजातिसमतां गतम् ॥ १२४ ॥ फिर उसने कहा कि, दुनियामें आदमी धनसे बलवान् और धनसेही पण्डित माना जाता है ॥ इस पापी चूहेको देखो ( धनहीन होनेसे ) अपनी जातिके समान हो गया ॥ १२४ ॥ किं च,— अर्थेन तु विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः। क्रियाः सर्वा विनश्यन्ति ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ १२५ ॥ और धनसे रहित बुद्धिहीन मनुष्यके तो सब काम बिगड़ जाते हैं, जैसे गरमीकी ऋतुमें छोटी छोटी नदियां (सूख जा कर बिगड़ जाती हैं) ॥ १२५ ॥ अपरं च,— यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स हि पण्डितः ॥ १२६ ॥ और दुनियामें जिसके पास धन है उसीके सब मित्र और उसीके बान्धव हैं; और जिसके पास धन है वही महान् पुरुष और वही बड़ा पण्डित है ॥ १२६ ॥ अन्यच्च,— अपुत्रस्य गृहं शून्यं सन्मित्ररहितस्य च । मूर्खस्य च दिशः शून्याः सर्वशून्या दरिद्रता ॥ १२७ ॥ और सच्चे मित्रसे हीन और पुत्रहीन (पुरुष)का घर सूना है । मूर्खकी सब दिशाएँ सूनी हैं, अर्थात् मूर्खताके कारण कहीं आदर नहीं पा सकता है, और दरिद्रता तो सब सूनोंका (केन्द्र) स्थान है अर्थात् सब सुखोंसे रहित है ॥ १२७ ॥ अपि च,— दारिद्र्यान्मरणाद्वापि दारिद्र्यमवरं स्मृतम् । अल्पक्लेशेन मरणं दारिद्र्यमतिदुःसहम् ॥ १२८ ॥