हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-१७२ ] क्रियाशील निपुणकी प्रशंसा ६५ वैसा कहा भी है—जो कुछ दान करता है और खाता है वही धनीका धन है, नहीं तो दूसरे मनुष्य मरे हुए मनुष्यके धन तथा स्त्रियोंसे क्रीडा करते हैं ॥ १६८ ॥ किंच,— यद्ददासि विशिष्टेभ्यो यच्चाश्नासि दिने दिने । तत्ते वित्तमहं मन्ये शेषं कस्यापि रक्षसि ॥ १६९ ॥ और जो सुपात्रोंको देते हो और नित्य खाते ( उपयोग करते ) हो मैं उसीको तुम्हारा धन मानता हूं, और शेष तो दूसरेका है. तुम केवल रक्षा करते हो १६९ यातु, किमिदानीमतिक्रान्तोपवर्णनेन ? जाने दो, जो हो गया सो हो गया, उसके वर्णनसे क्या लाभ है ? यतः,— नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् । आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ॥ १७० ॥ क्योंकि—चतुर मनुष्य जो दुर्लभ वस्तु है उसे चाहते नहीं हैं. जो नष्ट हो गई, उसका सोच नहीं करते हैं, और आपत्तिकालमें मोह नहीं करते हैं ॥ १७० ॥ तत्सखे ! सर्वदा त्वया सोत्साहेन भवितव्यम् । इसलिये मित्र ! अब तुमको सदा आनन्दसे रहना चाहिये । यतः,— शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् । सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥ १७१ ॥ क्योंकि—शास्त्र पढ़ कर भी मूर्ख होते हैं परन्तु जो क्रियामें चतुर है वही सच्चा पण्डित है. जैसे अच्छे प्रकारसे निर्णय की हुई औषधिभी रोगियोंको केवल नाममात्रसे अच्छा नहीं कर देती है ॥ १७१ ॥ अन्यच्च,— न स्वल्पमप्यध्यवसायभीरोः करोति विज्ञानविधिर्गुणं हि । अन्धस्य किं हस्ततलस्थितोऽपि प्रकाशयत्यर्थमिह प्रदीपः ? ॥ १७२ ॥ हि० ५