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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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७६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः २०३- यितव्यम् ।' अनन्तरं स वञ्चकः कर्पूरतिलकसमीपं गत्वा साष्टाङ्गपातं प्रणम्योवाच—'देव ! दृष्टिप्रसादं कुरु' । हस्ती ब्रूते—'कस्त्वम् ? कुतः समायातः ?' । सोऽवदत्—'जम्बुकोऽहम् । सर्वैश्चैनवासिभिः पशुभिर्मिलित्वा भवत्सकाशं प्रस्थापितः । यद्विना राज्ञाऽवस्थातुं न युक्तम्, तदात्राटवीराज्येऽभिषेक्तुं भवान् सर्वस्वामिगुणोपेतो निरूपितः । ब्रह्मवनमें कर्पूरतिलक नामक हाथी था । उसको देख कर सब गीदड़ोंने सोचा 'यदि यह किसी उपायसे मारा जाय तो उसकी देहसे हमारा चार महीनेका भोजन होगा।' उनमेंसे एक बूढ़े गीदड़ने इस बातकी प्रतिज्ञा की-'मैं इसे बुद्धिके बलसे मार दूँगा' । फिर उस धूर्तने कर्पूरतिलक हाथीके पास जा कर साष्टांग प्रणाम करके कहा-'महाराज ! कृपादृष्टि कीजिये ।' हाथी बोला—'तू कौन है ? कहांसे आया है' ? वह बोला—'मैं गीदड़ हूं,' सब वनके रहने वाले पशुओंने पंचायत करके आपके पास भेजा है, कि बिना राजाके यहां रहना योग्य नहीं है इसलिये इस बनके राज्य पर राजाके सब गुणोंसे शोभायमान होने के कारण आपको ही राजतिलक करनेका निश्चय किया है. यतः,— यः कुलाभिजनाचारैरतिशुद्धः प्रतापवान् । धार्मिको नीतिकुशलः स स्वामी युज्यते भुवि ॥ २०३ ॥ क्योंकि—जो कुलाचार और लोकाचारमें निपुण हो तथा प्रतापी, धर्मशील, और नीतिमें कुशल हो वह पृथिवी पर राजा होनेके योग्य होता है ॥ २०३ ॥ अपरं च पश्य,— राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकेऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनम् ? ॥२०४॥ और देखो—पहले राजाको ढूंढ़ना चाहिये, फिर स्त्री और उसके बाद धनको ढूंढ़े, क्योंकि राजाके नहीं होनेसे इस दुनियामें कहांसे स्त्री और कहांसे धन मिल सकता है ? ॥ २०४ ॥ अन्यच्च,— पर्जन्य इव भूतानामाधारः पृथिवीपतिः । विकलेऽपि हि पर्जन्ये जीव्यते न तु भूपतौ ॥ २०५ ॥