इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextस्फटिक मणि के समान सफेद, द्रव्यता, चिकना, मधुर गन्ध, मधुगन्ध। यह शुद्ध वीर्य के लक्षण हैं।
शुद्ध आर्तव-
शशास्तकप्रतिमं यत् तु यद्वा लाक्षारसोपमम्।
तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वांसो न विरज्यते॥
श्रुत २१२४
खरगोश के रक्त समान, लाल, लाख के रंग का, जो वस्त्र पर से धोने से छूट जाय। यह शुद्ध आर्तव के लक्षण हैं।
रजः-वीर्य के पूर्ण शुद्ध होने के पश्चात् भी चाहे कितना ही समर्थवान् पुरुष हो तो भी गर्भ स्थित नहीं होगा। गर्भ स्थित तब होगा जब दोनों को सामर्थ्य समान हो और एक साथ ही दोनों स्वलिप्त हों। स्वलिप्त रजः - वीर्य मिलकर गर्भाशय में प्रवेश करेगा तभी गर्भ स्थापित होगा। आगे पीछे-स्वलिप्त होने पर गर्भ स्थिति कभी नहीं होगा।
संस्कृत साहित्य में यह स्वीकारा जाता है कि कोई भी शब्द किसी का पर्यायवाची नहीं होता, प्रत्येक शब्द का अपना अस्तित्व होता है, अपना अर्थ होता है, और उपयोग भी उसका अपना अलग हो जाता है।
'शुक्राणु' और 'शुक्रकौट' यह दोनों शब्द अलग-अलग हैं। इन दोनों में स कोई भी किसी का पर्यायवाची नहीं, दोनों ही स्वतन्त्र हैं। दोनों के अर्थ भी भिन्न-भिन्न हैं। दोनों को क्रिया, कार्य, उपाधि सब कुछ अलग-अलग हैं। दोनों का एक अर्थवाची स्थान पर प्रयोग करना गलत है। शुक्रकौट का अर्थ है सन्तानोत्पादक जीव की उपस्थिति। शुक्राणु का अर्थ है शुक्र में आकृति, लोम, स्वभाव, ऊर्जा, ओज, शक्ति, सामर्थ्य और अणु का अर्थ है शुक्र का छोटे से छोटा कण। पूर्ण अर्थ बना 'शुक्राणु' शुक्र का प्रत्येक छोटे से छोटा कण ऊर्जा, ओज, शक्ति, और सामर्थ्य से सम्पन्न होने के नाते उसके समस्त कण गतिमान प्रतीत होते हैं। यह बात
इच्छानुसार सन्तान
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वारेन्द्र गुप्तः
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