इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextभी प्रगट हो जाते हैं।
गर्भ की नाभि में जो नाल लगी रहती है वह गर्भिणी माता के हृदय से बँधी रहती है उसके द्वारा माता के आहारजनित रस का उपस्तेह उस गर्भ को पुष्ट करता रहता है।
चौथे मास में सम्पूर्ण अंग प्रगट हो जाते हैं। पीचवें मास में गर्भ में चेतना शक्ति आ जाती है। छठे मास में स्नायु, शिरा, रोम, कंश, वर्ण और त्वचा ये सब उत्पन्न हो जाते हैं। सातवें मास में सब भावों से सर्वांग सम्पूर्ण गर्भ पुष्ट हो जाता है।
आठवें मास में ओज माता और गर्भ के शरीर में बार-बार संचार करता है इसलिए वे दोनों कभी मुदित और कभी म्लीन हो जाते हैं। जब ओज का संचार गर्भ में होता है तब माता म्लीन और क्लान्त-सी हो जाती है तो गर्भ प्रसन्न हो जाता है। जब ओज माता में आ जाता है तो गर्भ क्लान्त हो जाता है यही कारण है कि आठवें मास में ओज स्थिर न होने के कारण आठवें मास में उत्पन्न हुआ बालक जीवित नहीं रह पाता। किन्तु स्त्री के जीवन में संशय रहता है। यदि आठवें मास में बालक की उत्पत्ति के समय ओज स्त्री को न मिल कर गर्भ के पास पहुँचता है और उस ओज सहित गर्भ निकल जाता है अर्थात् प्रसव हो जाता है तो स्त्री की मृत्यु हो जाती है अन्यथा स्त्री जीवित रहती है।
अष्टांगहृदय संहिता
शरीर स्थान
★★★
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri