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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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मैंने लाक्षागृह से निकल कर एक चकरा नाम के एक नगर में पुत्रों सहित एक ब्राह्मणी के गृह पर निवास किया, उस ब्राह्मणी के एक पुत्र था। उस नगर में एक ब्रह्म नाम के राक्षस ने उपद्रव मचा रखा था। वह एक व्यक्ति को नगर से नित्य उठा ले जाता था और उसे खा जाता था। राजा ने तंग आकर अपनी प्रजा में से बारी नियत कर दी थी। जिसकी बारी होती वही अपने पुत्र को स्वयं एक स्थान पर पहुँचा देती थी।

एक दिन उस ब्राह्मणी के पुत्र की बारी आई। पुत्र की ममता का हाल आपको क्या बताऊँ पुत्रवती स्त्रियाँ ही जानती हैं। वह जल बिना मीन जैसे तड़पती थी। उसे व्याकुल देख मेरा भी हृदय कम्पित हो उठा, मैंने उससे कहा कि तू इतनी व्याकुल, विकल न हो मेरे साथ मेरे पाँच पुत्र हैं मैं उनमें से एक को आज तेरे पुत्र के बदले भेज दूँगी। उसने मेरी बात का विश्वास न करके अपने विद्यारानुकूल उत्तर दिया कि संसार में कहीं ऐसा हुआ है, मुझे जितनी एक की ममता है तुझे उतनी ही पाँच की होगी, हाथ की पाँच उंगलियों में से जिसे काटो उसी में दर्द होता है। क्या तुझे अपना कोई पुत्र भारू है वा कुथारा है मैंने कहा मेरे सब झींझों के तारे और प्राणों से प्यारे हैं, परन्तु सब शुभ कर्मों का निचोड़ (तत्व) परोपकार है।

आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन्तनको न जीवति मानवः।

परपरोपकारार्थ योजीवति सजीवति॥

परोपकार शून्यस्य धिड् मनुष्यस्य जीवितम्।

धन्यास्ते पशवो येषां चर्मोप्युपकरिष्यति॥

अर्थ- अपने लिए तो सभी जीते हैं पर जीना उसका है जो दूसरों के लिए जीता है। जो उपकारी नहीं उससे तो पशु ही अच्छे हैं जो मरने पर भी चमड़े से उपकार करते हैं।

अन्त को मैंने भीम को उस दुष्ट राक्षस की भेंट के लिये भेजा। इसने जाकर प्रथम तो सब पकवानादि जो स्त्रियाँ लायी थीं

इच्छानुसार सन्तान

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योगेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri