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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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यह प्राकृतिक बात है। परन्तु मातायें उसको यह समझ बैठती हैं कि वह ने घर में आते ही लड़के को भड़का कर मुझसे बोलना कम करा दिया। बस यहीं सास वह, माता पुत्र के बीच अज्ञानता के कारण वैमनस्य की दीवार खड़ी हो जाती है। जब माता वह को, चेत कर बुरा भला कहती है तो पुत्र समझता है कि माता को हमारे प्रेम से चिढ़ है और माता सोचती है वह ने पुत्र को मेरे विरुद्ध कर दिया। परन्तु ना तो माता दाम्पत्य प्रेम से चिढ़ती है और न वह पुत्र को माता के विरुद्ध करती है। यह दोनों की अज्ञानता का कारण है।

“प्रेम विकसित नहीं सीमित है।”

जो प्रेम विवाह से पूर्व माता-पिता भाई बहिनों आदि में विभक्त रहता है वही प्रेम विवाह के पश्चात् सब ओर से खिंचकर पत्नी में केन्द्रित होने लगता है। यही कारण है कि विवाह के पश्चात् माता-पिता आदि से प्रेम का कुछ अंश में कम हो जाना।

स्त्री प्रेम की प्रतिमा है वह प्रेम चाहती है। चाहे वह प्रेम माता का हो, सास का हो, पुत्र का हो या पति का हो। चूड़्यावस्था में माता को पुत्र के प्रेम की आशा होती है यदि वह उस प्रेम को कम करके विवाह के पश्चात् पत्नी को दे देता है तो उससे माता को स्वाभाविक ठेस पहुँचोगी। परन्तु वह माता यह नहीं सोचती कि यदि पुत्र ने अपने प्रेम का मेरा अंश कम करके अपनी पत्नी को दे दिया तो क्या हो गया। क्या वह अपने माता-पिता के भाग का प्रेम का अंश मुझे नहीं देगी? वह अपने माता-पिता का प्रेम सास ससुर को देती है और यदि पुत्र वधू को सास का भी प्रेम प्राप्त हो जाय तो उसके हृदय में जितना सास का प्रेम स्थान ले चुका है उतना कम स्थान पति का प्रेम लेगा। क्यों?

“जिस प्रकार प्रेम सीमित है उसी प्रकार प्रेम का स्थान भी सीमित है।”

फिर पुत्र का बचा हुआ प्रेम पुनः माता की ओर खिंचेगा

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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