इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextधन धरा के बीच सारा ही गड़ा रह जायगा। पशु भी बँधे रह जायंगे जब कूँच का दिन आयेगा।। नार घर के द्वार तक ही साथ देगी लोक में। मित्र दल मरघट से आगे साथ नहीं दिखलायेगा।। देह भी तेरी चिता के बीच जल-भुन जायेगी।। यह दृश्य आगे का तुझे क्या चेत में नहीं लायेगा।। एक वस ध्रुव धर्म ही सच्चा सखा है अन्त का। जोड़ इस में प्रेम अपना नित नये सुख पायेगा।।
बिना धर्म कर्म के मनुष्य पशवत् है।
येषां न विद्या न तपो न दानं, न चापि शीलं न गुणो न धर्मः। ते मृत्युलोकं भुवि भारभूता, मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति॥
चाणक्य नीति १०/७
अर्थ- जिन लोगों को न विद्या है, न तप है, न दान है, न शील है, न गुण है, और न धर्म है, वे संसार में पृथ्वी का भार रूप होकर मनुष्य रूप में मृग (पशु) फिर रहे हैं। क्योंकि-
आहार निद्रा भय मैथुनानि, समानि चैतानि नृणां पशूनाम्। ज्ञानन्तराणामधिको विशेषो, ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः॥
चाणक्य नीति १७/१७
अर्थ- भोजन, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्य और पशुओं में समान ही हैं। मनुष्य में केवल विशेष ज्ञान ही अधिक है। ज्ञान से रहित मनुष्य पशु के समान है।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः। सर्वं ज्ञान प्लवेनैव वृजिनं संतीरिष्यसि॥
गीता ४/१६
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri