इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextसुख और आनन्द पूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके तथा अपने जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए भरसक प्रयत्न करने के साथ सफलता प्राप्त कर सके। सांसारिक तथा धार्मिक कर्मों को सम्पादित कर दोनों लोकों में स्वर्गानन्द, यश और कीर्ति लाभ कर सकें। गृहस्थ आश्रम में मनुष्य को सांसारिक सुख भोग के साथ ही साथ किस प्रकार अपने शरीर को स्वस्थ रखते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। शास्त्रकारों ने मनुष्य जीवन की आयु १०० वर्ष की मानकर उसके चार समान भाग किये हैं प्रत्येक भाग को आश्रम के नाम से पुकारते हैं।
१. ब्रह्मचर्य आश्रम २५ वर्ष की अवस्था तक
२. गृहस्थ आश्रम ५० वर्ष की अवस्था तक
३. वानप्रस्थ आश्रम ७५ वर्ष की अवस्था तक
४. संन्यास आश्रम १०० वर्ष की अवस्था तक
परचातृ तक
★★★
ऋतु
वर्ष के १२ मासों में, १.चैत्र-वैशाख वसन्त ऋतु है। २.ज्येष्ठ-आषाढ़ ग्रीष्म ऋतु है। ३.श्रवण-भाद्रपद वर्षा ऋतु है। ४.आश्विन-कार्तिक शरद ऋतु है। ५.मार्गशीर्ष-पौष हेमन्त ऋतु है। ६.माघ फाल्गुन शिशिर ऋतु है। यह छः ऋतुयें हमारे देश में होती हैं।
ग्रीष्म ऋतु में वात का संचय वर्षा में कोप और शरद ऋतु में शान्ति रहती है। वर्षा ऋतु में पित्त का संचय, शरद में कोप और हेमन्त ऋतु में शान्ति रहती है। इसी प्रकार 'शिशिर ऋतु में कफ का संचय वसन्त में कोप और ग्रीष्म ऋतु में शान्ति होती है। यह वात-पित्त और कफ का संचय कोप और शान्ति आहार-विहार से होती है। इसलिए इन दोषों के प्रकोपकर्ता आहार-विहार
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri