इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
Page 71 of 250
Read in contextकाम की इच्छा करता है और उपस्थेन्द्रियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।
इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।
वीर्य
वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्न पूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।
ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
सिद्धे विन्दो महा यत्ने।
किं न सिध्यति भूतले॥
अर्थ- जिसने वीर्य विन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके
इच्छानुसार सन्तान
६७
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri