जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextभानसोधन ] ८५ सेमें याँहि तत्थ अरी उदीरितो, जिस पानी में हमारा कल्याण था, जहाँ निर्भयता थी, वही से विरोधी, शत्रु पैदा हो गया । उदरस्स, पानी के, घतासनो, अग्नि । वह घृत खाती है, इसी लिए घतासन कहलाई । न अज्ज वासो, आज हमारा रहना नहीं है । महिया महीरुहे, महीरुह कहते हैं वृक्ष को, उस इस पृथ्वी में से पैदा हुए वृक्ष में । दिसा भजव्हो, दिशाओं में जाओ । सरणञ्च नो भय, आज हमारे शरणस्थान से ही भय पैदा हो गया । प्रतिशरणस्थान ही भय का जनक हो गया ।
ऐसा कह बोधिसत्व अपना कहना मानने वाले पक्षियों को लेकर अन्यत्र चले गए । बोधिसत्व का कहना न मान जो पक्षीगण वहीं रहे वह मर गए । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला चार आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । आर्य-सत्यों के प्रकाशन के अंत में वह भिक्षु अर्हत् हो गया । उस समय बोधिसत्व का कहना मानने वाले पक्षीगण बुद्ध परिषद हुई । पक्षि-राजा तो मैं ही था । १३४. भानसोधन जातक “ये सञ्चिन्नो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय सङ्कस्स नगर द्वार पर सक्षेप में पूछे गए प्रश्न की धर्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा विस्तृत व्याख्या के बारे में कही । अतीत कथा इस प्रकार है— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणमी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने एकान्त जगल में मृत्यु को प्राप्त होते समय शिष्यो के पूछने पर सक्षेप से उत्तर