जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context११६ [ १.१५ १४५ यं तं वालधिनाभिपूजयाम, आज हम तुझे जो अपनी पास की चीज भी सु- रक्षित नहीं रख सकता उसकी पूंछ से पूजा कर रहे हैं। यही प्रकट करता है कि यह भी तेरे लिए बहुत कर रहे हैं। मसारहस्स, तुझे मांस चाहिए था। आज तेरे लिए मांस यही है। सङ्गुट्ठम्पि भव परिग्गहातु, अपनी चीज को रख सकने में असमर्थ आप यह खुरसहित जांघ का चर्म और पोंछ भी ग्रहण कर। इस प्रकार कह बोधिसत्व आग को पानी से बुझा ऋषि-प्रव्रज्या के अनु- सार प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर ब्रह्मलोक-परायण हुआ। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। आग को बुझानेवाला तपस्वी उस समय मैं ही था। १४५. राध जातक “न त्वं राध ! विजानासि...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते हुए पूर्व-भार्या के प्रति आसक्ति के बारे में कही। वर्तमान-कथा इन्द्रिय-जातक¹ में आएगी। शास्ता ने उस भिक्षु को बुलाकर कहा—भिक्षु स्त्रिया को बचाया नहीं जा सकता। पहरेदार रखने से भी उनकी देखभाल नहीं हो सकती। तू भी पहले पहरेदार रखकर भी नहीं बचा सका। अब कैसे बचा सकेगा ? इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही-- ¹ इन्द्रिय जातक (४२३)