जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextकाक ] ११६ सोचा कि हम बूढे हुए। हमें गृहस्थी से क्या लाभ ? शास्ता के पास रमणीय बुद्ध-शासन में प्रव्रजित हो हम दुख का अन्त करें । वे अपनी सारी जायदाद लडके लडकियो को दे, रोते हुए रिश्तेदारो को छोड शास्ता से प्रव्रज्या की याचना कर प्रव्रजित हुए। लेकिन प्रव्रजित होने पर प्रव्रज्या के अनुकूल श्रमण धर्म की पूर्ति नही की। बूढे होने से धर्म भी नही सीख सके। गृहस्थ रहने के समय की तरह प्रव्रजित होने पर भी विहार के एक कोने मे पर्ण-शाला बनवाकर उसमें इकट्ठे ही रहते थे। भिक्षा माँगने के लिए भी प्राय और कही न जाकर अपने लडके लडकियो के घर जाकर वही खाते थे। उनमे से एक की पहली भार्या सभी वृद्ध भिक्षुओ का उपकार करनेवाली थी। इसलिए बाकी जनो को जो भिक्षा मिलती उसे लेकर भी उसी के घर जा बैठकर खाते। वह भी उनको जो सूप व्यञ्जन तैयार होता देती । किसी बीमारी से वह मर गई। वह वृद्ध स्थविर विहार जाकर एक दूसरे के गले मिल विहार के आसपास यह कहते हुए रोने लगे—"जिसके हाथो मे मधुर-रस था, वह उपासिका मर गई।" उनकी आवाज सुनकर इधर-उधर से भिक्षुओ ने आकर पूछा—"आयुष्मानो ! क्यो रो रहे हो ?" वे बोले—"हमारे मित्र की पहली भार्या मर गई है। उसके हाथ में मधुर रस था। वह हमारा बहुत उप- कार करने वाली थी। अब वैसी स्त्री कहाँ मिलेगी ? इसी वजह से रो रहे है।" उनको विलाप करते देख भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई— "आयुष्मानो ! इस कारण से वृद्ध स्थविर एक दूसरे के गले में हाथ डाल रोते हुए घूम रहे हैं।" शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर शास्ता ने कहा—' भिक्षुओ, यह केवल अभी उसके मरने पर रोते हुए नही घूम रहे हैं। पहले भी इन्होने इसके कौए की योनि में पैदा हो समुद्र में मरने पर सोचा कि समुद्र का पानी उलीचकर इसे निकाल लाएंगे । ये परिश्रम करते हुए (कठिनाई से) पण्डितो द्वारा जीवित बचाए गए।"—इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।