जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context१२४ [ १.१५ १४८ १४८. सिगाल जातक “नाह पुन न च पुन...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कामुकता का निग्रह करने के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में पाँच सौ महाधनवान्, सेठो के पुत्र, जिनकी परस्पर मित्रता थी शास्ता का धर्मोपदेश सुन शासन में दिल से प्रव्रजित हो जेतवन के उस हिस्से में रहने लगे जिसमें अनाथपिण्डिक ने कार्षापण बिछवाए थे। एक दिन आधी रात के समय उनके मन मे कामुकता का भाव पैदा हुआ। उन्होने उद्विग्न होकर एक बार छोडे हुए कामुकता के विचार को फिर अपनाने की सोची। शास्ता ने आधी रात के समय अपने सर्वज्ञता रूपी ज्ञान-दण्ड-प्रदीप को उठाकर देखा कि इस समय जेतवन के भिक्षुओ के मन में क्या विचार उत्पन्न हो रहे हे। उन्हें पता लगा कि उन भिक्षुओ के मन में कामुकता का भाव पैदा हुआ है। बुद्ध अपने शिष्यो की उसी तरह रक्षा करते है जैसे एक ही पुत्रवाली स्त्री अपने पुत्र की अथवा एक ही आँखवाला अपनी आँख की। पूर्वाह्न आदि जिस किसी समय मे भी उनके मन में बुरे विचार आते है, वे उन्हें अधिक न बढ़ने देकर तुरन्त निग्रह करते है। इसलिए उनके मन में ऐसा हुआ कि यह तो चक्र- वर्ती राजा के नगर के अन्दर ही चोरो के दाखिल हो जाने जैसी बात है। में अभी उन्हें धर्मोपदेश कर, उनके बुरे सकल्पो का निग्रह कर उन्हें अर्हत्व दूंगा। उन्होंने सुगन्धित गन्धकुटी से निकल आयुष्मन् आनन्द स्थविर को जो कि धर्म के खजानची थे, मधुर स्वर से बुलाया- "आनन्द !" स्थविर “क्या आज्ञा है भन्ते !” कह प्रणाम करके खड़े हुए।