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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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एकपण्ण ] १३३ रस चखो। उसने उसका एक पत्ता मुंह में रखने ही उसका रस चख "थू" करके जमीन पर थूका। "कुमार यह क्या ?" "भन्ते ! यह पौधा अभी हलाहल विष के समान है, बड़े होने पर तो यह बहुत मनुष्यों की जान लेगा।" इतना कहते हुए उसने नीम के पौधे को उखाड़कर हाथों से मल डाला और यह गाथा कही— एकपण्णो अय रुक्खो न भुम्या चतुरङ्गलो, फलेन विस कप्पेन महाय किं भविस्सति ॥ [ इस पौधे का केवल एक पत्ता है और यह भूमि से चार अंगुल ऊँचा नहीं। विष जैसे पत्तेवाला यह बड़ा होकर क्या होगा । ]

एक पण्णो, दोनों ओर एक एक पत्ता है। न भुम्या चतुरङ्गुलो, भूमि से चार अंगुल भी ऊँचा नहीं बढ़ा है। फलेन, अर्थात् पत्ते से। विसकप्पेन, हलाहल विष जैसे से। इतना छोटा होता हुआ भी ऐसे कड़वे फल वाला है। महायं किं भविस्सति, जब यह वृद्धि पाकर बड़ा होगा तब कैसा होगा ? निश्चय से मनुष्य की जान लेने वाला होगा। इसी से उखाड़ कर हाथ से मलकर फेंक दिया—यह कहा। तब बोधिसत्त्व ने उसे कहा—'कुमार ! तूने इस पौधे को यह सोचकर कि यह अभी से इतना तीता है, बड़े होने पर इससे किसी की क्या उन्नति होगी, तोड़ कर, मरोड़ कर फेंक दिया। जैसे तूने इसके प्रति बरताव किया, ठीक इसी तरह तेरे राष्ट्र के बासी भी यह सोचेंगे कि यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव का है, बड़ा होने पर राज्य प्राप्त करके क्या करेगा ? इससे हमारी उन्नति कहाँ होगी ? वह तुझे राज्य न दे, नीम के पौधे की तरह उखाड़कर तुझे राष्ट्र से निकाल देंगे। इसलिए नीम के पौधे के स्वभाव को छोड़ अब से शान्ति, मैत्री तथा दया से युक्त हो। उस समय से उसने अभिमान छोड़ दिया। नम्र हो गया। शान्ति, मैत्री और दया से युक्त हो बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार आचरण कर पिता के मरने पर राज्य प्राप्त किया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करता हुआ यथाकर्म (परलोक) सिधारा।