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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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सञ्जीव ] १३५

उसे निगले जा रही हो, तप्त लोह शय्या पर लिटाकर लोहे की कीलें ठोकी जा रही हो। इससे उस राजा को चोट खाए मुर्ग की तरह क्षण भर के लिए भी शान्ति न थी, कांपता ही रहता था। उसने सम्यक् सम्बुद्ध के दर्शन कर उनसे क्षमा माँगने की तथा शंका मिटाने की इच्छा थी। लेकिन अपने अपराध के भार के कारण उसकी जाने की हिम्मत न हुई। राजगृह नगर में कात्तिकोत्सव था। नगर देवनगर की तरह अलङ्कृत था। महल पर अमात्यगणों से घिरा राजा स्वर्ण सिंहासन पर बैठा था। उसने देखा कि कौमारभृत्य जीवक पास ही बैठा है। उसके मन मे आया कि मै जीवक को लेकर सम्यक् सम्बुद्ध के पास जाऊँ। लेकिन उसने साथ ही सोचा कि मैं जीवक को सीधा तो यह नही कह सकता कि हे जीवक ! मै सम्यक् सम्बुद्ध के पास जाना चाहता हूँ। अकेला नही जा सकता। मुझे बुद्ध के पास ले चल। मै उसे एक ढग से कहूँगा—रात्रि के सौन्दर्य की प्रशंसा करके पूछूँगा कि आज हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका सत्संग करने से मन प्रसन्न हो। इसे सुन कर आमात्य अपने अपने शास्ता की प्रशंसा करेंगे। जीवक भी सम्यक् सम्बुद्ध की प्रशंसा करेगा। तब उसे लेकर बुद्ध के पास जाऊँगा। उसने पाँच पदो से रात्रि की प्रशंसा की—"भो ! चांदनी रात्रि लक्षण- सम्पन्न है। भो ! चांदनी रात्रि सुन्दर है। भो ! चांदनी रात्रि दर्शनीय है। भो ! चांदनी रात्रि मन को प्रसन्न करने वाली है। भो ! चांदनी रात्रि रमणीय है। आज की रात हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका सत्संग करने से चित्त प्रसन्न हो ?" एक आमात्य ने पूरण कश्यप की प्रशंसा की। एक ने मक्खलि गोशाल की। एक ने अजित केश कम्बल की। एक ने प्रबुध कात्यायन की। एक ने बेलट्ठिपुत्र सञ्जय की। एक ने निर्ग्रन्थनाथपुत्र की। राजा उनकी बातचीत सुन चुप रहा। वह महामात्य जीवक के कहने का ही विश्वास करता था। जीवक ने भी यह सोचकर कि जब राजा मेरे प्रति कुछ कहेगा, तभी देखूँगा मौन ही रक्खा। राजा ने पूछा—"जीवक ! तू क्यो चुप है ?" तब जीवक ने आसन से उठ जिधर भगवान् थे उधर हाथ जोडकर कहा—देव ! यह भगवान् अर्हंत सम्यक् सम्बुद्ध हमारे आम्रवन में रहते हैं।