जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context१३८ [ १.१५.१५० [जो दुश्चरित्र को बड़प्पन देता है, जो दुराचारी की संगत करता है, उसे वह दुराचारी वैसे ही खा जाता है जैसे जीवन-प्राप्तं व्याघ्र ।] असन्तं—तीन प्रकार¹ के दुश्चरित्र से युक्त, दुश्शील, पापी। यो पग्गण्हाति, क्षत्रिय आदि में जो कोई इस प्रकार के दुराचारी प्रव्रजित को चीवर आदि देकर अथवा गृहस्थ को उपराज वा सेनापति आदि का पद देकर बड़प्पन देता है, सत्कार तथा सम्मान प्रदर्शित करता है। असन्तञ्चुपसेवति, जो इस प्रकार के दुश्शील की संगति करता है। तमेव घासं कुरुते, उसी दुष्ट आदमी को, बड़प्पन देनेवाले को वह दुराचारी खा जाता है, नष्ट करता है। कैसे ? व्यग्घो सञ्जीविको यथा, जैसे सञ्जीवक नाम के विद्यार्थी ने मृत-व्याघ्र को मन्त्र पढ़कर जिलाया, जीवन-दान दे आदृत किया। उसने उस जीवन-दान देनेवाले सञ्जीवक का ही प्राण ले लिया। इस प्रकार जो कोई भी दुष्ट आदमी का आदर करता है, वह दुष्ट अपना आदर करनेवाले ही को नष्ट करता है ! इस तरह दुष्टो को बड़प्पन देनेवाले नाश को प्राप्त होते हैं। बोधिसत्त्व इस गाथा द्वारा विद्यार्थियो को उपदेश दे दानादि पुण्य करके कर्मानुसार परलोक सिधारे। शास्ता ने भी यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय मृत-व्याघ्र को जिलानेवाला विद्यार्थी अजातशत्रु था। चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था। ¹ काय, वाक् तथा मन के पाप-कर्म ।