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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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१५८ [ २१.१५५ यक्ष ने बोधिसत्त्व का वचन सुन सोचा कि इस माणवक ने 'जीवै' कहा है, इसलिए इसे नहीं खा सकता । इसके पिता को खाऊँगा । इसलिए पिता के पास गया । उसने उसे आते देख सोचा, यह यक्ष उन लोगों को खा लेता होगा, जो 'जीवै' के उत्तर में 'जीओ' न कहते होंगे । इसलिए मैं प्रतिवचन करूँगा । उसने पुत्र के बारे में दूसरी गाथा कही— त्वम्पि वस्स सत जीव अपराणि च वीसति, विस पिसाचा खादन्तु जीव त्व सरदोसत ॥ [ तू भी सौ वर्ष जीवित रह । और भी बीस वर्ष । पिशाच विष खाएँ । तू सौ वर्ष जीवित रह । ] विस पिसाचा, पिशाच हलाहल विष खाएँ । यक्ष ने उसकी बात सुन सोचा, मैं दोनों में से किसी को नहीं खा सकता । वह रुक गया । बोधिसत्त्व ने पूछा—'भो यक्ष ! इस शाला में प्रवेश करनेवाले आदमियों को तू क्यों खाता है ?' “बारह वर्ष कुबेर की सेवा करके अधिकार प्राप्त किया है ।” “क्या सभी को खाने का अधिकार है ?” “'जीवै' और 'जीओ' कहने वाला को छोड़ शेष सभी को खाता हूँ ।” “यक्ष ! तूने पहले बुरे कर्म किए । इसलिए तू निर्दयी, कठोर तथा दूसरों की हिंसा करनेवाला पैदा हुआ । अब फिर उसी तरह के काम करके तू तमोतम- परायण¹ हो रहा है। इसलिए अब से तू प्राणि हिंसा आदि से विरत हो ।” इस प्रकार उस यक्ष का दमन कर, नरक के भय से उसे डरा, पञ्चशीलों में प्रतिष्ठित कर यक्ष को दूत की तरह विनीत कर दिया । आगे चलकर आने जाने वाले मनुष्यों ने यक्ष को देखा और जब उन्हें मालूम हुआ कि बोधिसत्त्व ने उसका दमन किया, तो उन्होंने राजा से कहा—“देव ! ¹ अन्धकार से अन्धकार में जाने वाला = हीनकुल में पैदा होकर नीच कर्म करने वाला ।