जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context२०२ [ २-२ १६६ उस ब्राह्मण ने बूढा होने पर पुत्र को कहा—'तात ! मुझे किसी ऐसे श्मशान में मत जलाना जहाँ कोई चाण्डाल जलाया गया हो। मुझे किसी ऐसे ही श्मशान में जलाना जहाँ पहले कभी कोई न जलाया गया हो।” “तात ! मैं नही जानता कि आपको मुझे वहाँ जलाना चाहिए। बहुत अच्छा हो, मुझे साथ ले जाकर आप बता दें कि मुझे तुम इस जगह जलाना।” ब्राह्मण ने 'तात ! अच्छा' कह, और उसे ले जा नगर से निकल गृध्र- कूट पर्वत पर चढ कहा—'तात ! यहाँ पहले कोई चाण्डाल नहीं जलाया गया है। मुझे यहाँ जलाना।” फिर वह पुत्र के साथ पर्वत से उतरने लगा। शास्ता ने प्रात काल ही ऐसे लोगो का विचार करते हुए जिनकी उस दिन ज्ञानप्राप्ति की सम्भावना थी उन पिता-पुत्र की श्रोतापत्ति-मार्गारूढ होने की सम्भावना को देखा। इसलिए मार्ग पकड एक शिकारी की तरह पर्वत की तराई में पहुँच उनके पर्वत से उतरते समय उनकी प्रतीक्षा करते हुए बैठे। उन्होने उतरते समय शास्ता को देखा। शास्ता ने कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा—"ब्राह्मण ! कहाँ गए थे ?” माणवक ने वह बात कही। शास्ता ने कहा—'तो आओ, तुम्हारे पिता ने जो स्थान बताया है, वहाँ चलें।' उन दोनो को साथ लेकर पर्वत के शिखर पर चढ पूछा—'कौनसी जगह है?' माणवक ने कहा—"भन्ते ! इन तीनो चोटियो के बीच में बताया है।” शास्ता बोले—'माणवक ! तेरे पिता केवल अभी श्मशान की शुद्धि मानने वाले नही है, पहले भी श्मशान की शुद्धि मानने वाले रहे हैं। न केवल अभी इसने तुझे कहा है कि मुझे इस स्थान पर जलाना, पहले भी इसने इसी स्थान पर जलाने के लिए कहा है।” इतना कह, माणवक के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में इसी राजगृह में यही उपसाल्हक ब्राह्मण था, यही इसका पुत्र था।