जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextसकुणिग्घि ] २०७ जीवित ब्याधि कालो च देहनिक्खेपन गति पञ्चेते जीवलोकस्मि अनिमित्ता न नायरे । [ जीव-लोक में इन पाँच बातो का पता नही लगता—(१) जीने की आयु, (२) रोग, (३) मृत्यु-समय, (४) शरीर के पतन का स्थान, (५) मरने पर क्या गति होगी ? ] छन्नो कालो न दिस्सति, इसलिए इस आयु में अथवा इस समय वा हेमन्त आदि ऋतुओ में से इस ऋतु में मुझे मरना होगा, यह मुझसे भी छिपा हुआ मृत्यु-समय मुझे दिखाई नहीं देता। अच्छी प्रकार ढका होने से प्रकट नही है। तस्मा अभुत्वा भिक्खामि इसलिए काम-भोगो को न भोग भिखारी बना हूँ। मा म कालो उपच्चगा, मेरा श्रमण धर्म करने का समय बीत न जाए। इसलिए तरुणाई में ही प्रव्रजित होकर श्रमण धर्म करता हूँ। देव-कन्या बोधिसत्त्व की बात सुन वही अन्तर्ध्यान हो गई। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला जातक का मेल बैठाया। उस समय देव-कन्या यही देव-कन्या थी। मैं ही उस समय तपस्वी था। १६८. सकुग्णग्घि जातक सेनो बलसा पतमानो, यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय अपने विचार के द्योतक सकुगोवाद सूत्र१ के बारे में कही। १ महावग्ग ।