जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextसकुणग्घि ] २०६ जब उस बटेर ने समझा कि बाज मेरे बहुत समीप आगया, तो वह पलट कर उस ढेले के अन्दर चला गया। बाज अपने जोर को न रोक सका। उसकी छाती ढेले से टकराई। इस प्रकार उसका कलेजा चूर चूर हो गया। आँखें निकल आईं। यह मर गया। शास्ता ने यह अतीत-कथा सुना कहा—‘भिक्षुओ ! इस प्रकार जानवर भी अयोग्य स्थान पर चरने से शत्रु के हाथ मे पड जाते है। योग्य स्थान में, अपने पैतृक स्थान में चरते हुए शत्रुओ को जीत लेते हैं। इसलिए तुम भी अयोग्य स्थान में, जो तुम्हारा विषय नही है, मत विचरो। अयोग्य-स्थान में, जो अपना विषय नही है विचरने वाले पर भिक्षुओ ! मार आक्रमण करता है। वह मार का निशाना बनता है। भिक्षुओ ! भिक्षुओ के लिए अयोग्य-स्थान, जो उनका विषय नही है, क्या है ? जो यह पाँच प्रकार के कामोपभोग हैं। कौन से पाँच ? आँख से देखे जाने वाले (प्रिय) रूप, कान से सुने जाने वाले शब्द, नाक से सूंघी आने वाली सुगन्धियाँ, जिह्वा से मजा लिए जानेवाले रस और शरीर से छुए जाने वाले स्पर्श—भिक्षुओ, यह भिक्षुओ के लिए अयोग्य- स्थान हैं। यह उनका विषय नही है।" इतना कह सम्यक सम्बुद्ध हुए रहने की अवस्था में प्रथम गाथा कही— सेनो बलसा पतमानो लापं गोचरठायिनं,१ सहसा अज्झपत्तो मरण तेनुपागमि ॥ [ बाज अपने बल को न रोक करके अपने योग्य-स्थान पर विचरन वाले बटेर पर झपटा। इसीसे वह मर गया।] बलसा पतमानो, बटेर को पकडन की इच्छा से जोर से गिरने वाला, गोचरठायिनं, अपने विषय (=प्रदेश) से निकल जगल तक चरने के लिए स्थित। अज्झपत्तो, पहुँचा। मरण तेनुपागमि, इस कारण से मर गया। १ अगोचर ठायिनं के स्थान पर गोचर ठायिन श्रेयस्कर प्रतीत होता है। १४