जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 238 of 479
Read in contextदुब्बभियमक्कट ] २२३ १७४. दुब्बभियमक्कट जातक “अदम्हु ते वारि बहूतहूपं...” यह शास्ता ने वेणुवन में रहते समय देवदत्त के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा एक दिन धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षु देवदत्त के अकृतज्ञता तथा मित्र-द्रोही भाव की चर्चा कर रहे थे। शास्ता ने कहा—“भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त अकृतज्ञ तथा मित्र-द्रोही है। पहले भी यह ऐसा ही था।” इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व किसी काशीग्राम में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर घर बसाया। उस समय काशी राष्ट्र की एक बड़ी चलने वाली सड़क पर एक गहरा कुआँ था। जानवरो की उस तक पहुँच नही हो सकती थी। इसलिए रास्ता चलने वाले पुण्यार्थी मनुष्य, लम्बी रस्सी बँधे बर्तन से पानी निकाल एक द्रोणी में भर जानवरो को पानी पिलाते थे। उसके चारो तरफ भारी जगल था। उसमें बहुत से बन्दर रहते थे। दो तीन दिन उस मार्ग से आदमियो का आना जाना न हुआ। जानवरो को पानी न मिला। एक प्यासा बन्दर पानी खोजता हुआ कुएँ के आस पास घूमता था। बोधिसत्त्व किसी काम से उस रास्ते से आए। जब वह वहाँ जा, पानी निकाल, पी, हाथ पाँव धो कर खड़े थे, उन्होने उस बन्दर को देखा। ज यह जानकर कि वह प्यासा है उन्होने पानी निकाल द्रोणी में डाल कर उसे दिया। पानी देकर वह विश्राम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे लेटे।