जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextकच्छप ] २३३ की बहुत जगह है। खज्जतञ्चेव तिन्दुक तिन्दुक फल खाओ। तुम्हें जितनी जरूरत है उतने फल खाओ। हमें मारने का समय आएगा तब देखेंगे। इस प्रकार महासत्त्व ने सब को दिलासा दिया। यह आश्वासन न मिलता तो डर था कि सभी हृदय फट कर मर जाते। महासत्त्व ने इस प्रकार वानरो को दिलासा दे कहा—सभी वानरो को इकट्ठा करो। इकट्ठे होने पर बोधिसत्त्व के सेनक नाम भानजे को न देखकर वह बोले कि सेनक नहीं आया। यदि सेनक नहीं आया तो मत डरो। वह अब कुछ अच्छा काम करेगा। वानरो के भागने के समय सेनक सोता रह गया था। पीछे उठ कर जब उसने किसी को न देखा तो वह भी वानरो के पीछे पीछे आया। रास्ते में उसने आदमियो को देखकर सोचा कि बानरो के लिए खतरा पैदा हो गया। उसने गांव के किनारे पर अग्नि जला कर कातती हुई एक स्त्री के पास जा, खेत पर जाने वाले लड़के की तरह उससे मशाल ले, जिधर की हवा थी उधर खडे हो गांव में आग लगा दी। आदमी वानरो को छोड़ कर आग बुझाने दौड़ पड़े। वानर भागे, लेकिन भागते हुए सेनक के लिए एक एक फल तोड़ कर लेते गए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भानजा सेनक महानाम शाक्य था। वानर समूह बुद्ध-परिषद थी। वानरेश तो में ही था। १७८. कच्छप जातक "जनित्तम्मे भवित्तम्मे..." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ऐसे आदमी के बारे में कही जो प्लेग से मुक्त हो गया था।