जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context.२४० [ २.३.१८० उपभोग करता है, बुद्ध द्वारा निन्दित, बुद्ध द्वारा निकृष्ट कही गई जीविका से जीविका चलाने के कारण उसके मुंह पर न हँसी आती है, न प्रसन्नता। शास्ता ने सम्बुद्धत्व प्राप्त किए रहने पर यह दूसरी गाथा कही— एवं धम्मं निरकत्वा यो अधम्मेन जीवति सतधम्मोव लाभेन लद्धेनपि न नन्दति ॥ [ इस प्रकार धर्म छोड़ जो अधर्म से जीता है। वह सतधर्म की तरह लाभ होने पर भी प्रसन्न नही होता।] धम्मं जीविका को शुद्ध रखने के सदाचार का धर्म। निरंकत्वा बाहर करके, छोड़ कर। अधम्मेन, इक्कीस तरह के अनुचित तरीको से जीविका खोजना। सतधम्मो उसका नाम है। न नन्दति जैसे सतधम्म माणवक चाण्डाल का जूठा मुझे मिला सोच उस लाभ से प्रसन्न नही होता। इसी प्रकार इस शासन में प्रव्रजित कुलपुत्र अनुचित ढंग से प्राप्त लाभ का परिभोग करता हुआ प्रसन्न नही होता, सन्तुष्ट नहीं होता। निन्दित जीविका से जीता हूँ सोच दुःखी ही होता है। इसलिए अनुचित ढंग से जीविका खोजने वाले के लिए यही अच्छा है कि वह सतधम्म माणवक की तरह जगल में जा अनाथ की तरह मर जाए इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मोपदेश कर चार आर्य(-सत्यो) को प्रका- शित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर बहुत से भिक्षुओ को स्रोतापत्ति आदि फल की प्राप्ति हुई। उस समय मै ही चाण्डालपुत्र था। १८०. दुद्दद जातक “दुद्ददं वदमान...” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय सामूहिक दान के बारे में कही।