जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextवाळोदक ] २५५ सो जाते और उठ कर अचिरवती नदी के किनारे जा कुश्ती लड़ते। लेकिन वह पाँच सौ उपासक हल्ला न मचाते हुए ध्यान-रत रहते थे। शास्ता ने उन जूठन खाने वालो का शोर सुनकर पूछा— "आनन्द ! यह शोर कैसा है ?" "भन्ते ! यह जूठन खाने वालो का शब्द है।" 'आनन्द ! यह जूठन खाने वाले केवल अभी जूठन खाकर शोर नही मचाते, पहले भी शोर मचाते रहे हैं, और यह उपासक भी न केवल अभी शान्त हैं पहले भी शान्त रहे हैं।" स्थविर के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व अमात्य कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर राजा के अर्थधर्मानुशासक का पद मिला। एक बार वह राजा यह सुन कि उसके इलाके में उपद्रव हो गया है, पांच सौ सैन्धव घोडे तैयार करा, चतुरंगिनी सेना के साथ जा, इलाके को शान्त कर बाराणसी लौट आया। उसने आज्ञा दी कि घोडे थके है, इसलिए उन्हें कोई नरम चीज अगूर का पेय ही पिलाया जाए। सैन्धव घोडे सुगन्धित पेय पीकर अश्व-शाला में आ अपनी अपनी जगह खड़े हो गए। उनको जो रस दिया गया था, उसमें से बचा हुआ बहुत कसैला हो गया। आदमियो ने राजा से पूछा—"इसका क्या करें ?" राजा ने आज्ञा दी—"इसमें पानी मिला, मोटे कपडे से छान, जो गधे घोडो का चारा ढो कर ले गए थे, उन्हे पिला दो।" पिला दिया गया। गधे उस कसैले पानी को भी मस्त होकर रेंकते हुए राजाङ्गण में घूमने लगे। राजा ने बडी खिड़की खोल राजाङ्गण को देखते हुए पास खडे बोधिसत्व को सम्बोधित करके कहा—"मित्र ! यह गधे कसैला पानी पीकर मस्त हो रेंकते हुए उछलते फिरते हैं। सिन्धु-कुल में पैदा हुए सैन्धव घोडे सुगन्धित पेय पीकर निःशब्द बैठे हुए उछलते कूदते नही हैं। इसका क्या कारण है ?" यह पूछते हुए राजा ने पहली गाथा कही—