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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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अनभिरति ] २५६ तनुजो, उसका अनुज, अनुकूल उत्पन्न हुआ होने से अनुज। मतलब यह है—महाराज ! यदि उस शृङ्गार-युक्त आचारवान् घोडे के अनुरूप आकार प्रकार वाला पोसो। सिखराकारकल्पितो शिखर अर्थात् सुन्दर तरह से जिसकी बाल दाढी कढी है। स घोडे को आनने गहेत्वा घोडे के घुमाने की जगह पर घुमाए। सो यह शीघ्र ही लँगडेपन को छोड, यह शृङ्गारयुक्त आचारवान् अश्व शिक्षक मुझे सिखा रहा है, समझ उसका अनुकरण करेगा, उसके अनुसार सीखेगा, स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त होगा। राजा ने वैसा करवाया। घोडा स्वाभाविक अवस्था में प्रतिष्ठित हुआ। यह सोच कि बोधिसत्त्व पशुओ तक के आशय को समझते हैं, उन्हें बहुत धन दिया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गिरिदत्त देवदत्त था। घोडा विरोधी पक्ष का साथ देने वाला भिक्षु। राजा आनन्द। अमात्य पण्डित तो में ही था। १८५. अनभिरति जातक “यथोदके आविले अप्पसन्ने ” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक ब्राह्मण कुमार के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में तीनो वेदो का जानकार एक ब्राह्मण-कुमार बहुत से क्षत्रिय तथा ब्राह्मणकुमारो को वेद पढाता था। आगे चलकर उसने घर बसाया। वस्त्र, अलङ्कार, दास, दासी, खेत, घरतु गो, भेंस, पुत्र तथा स्त्री आदि की